भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 150 में से

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पृष्ठ 136

मशीनें पाठक : आप पश्चिम की सभ्यता को निकाल बाहर करने की बात कहते हैं, तब तो आप यह भी कहेंगे कि हमें कोई भी मशीन नहीं चाहिए। संपादक : मुझे जो चोट लगी थी उसे यह सवाल करके आपने ताजा कर दिया है। मि. रमेशचन्द्र दत्त की पुस्तक 'हिन्दुस्तान का आर्थिक इतिहास' जब मैंने पढ़ी, तब भी मेरी ऐसी हालत हो गई थी। उसका फिर से विचार करता हूँ, तो मेरा दिल भर आता है। मशीन की झपट लगने से ही हिन्दुस्तान पामाल हो गया है। मैन्चेस्टर ने मुम्बई की मिलों में हमें जो नुकसान पहुँचाया है, उसकी तो कोई हद ही जो मजदूर काम करते नहीं है। हिन्दुस्तान से कारीगरी जो क़रीब-क़रीब खत्म हैं, वे गुलाम बन गए हो गई, वह मैन्चेस्टर का ही काम है। हैं, जो औरतें उनमें लेकिन मैं भूलता हूँ। मैन्चेस्टर को दोष कैसे दिया काम करती हैं, उनकी जा सकता है? हमने उसके कपड़े पहने तभी तो उसने हालत देखकर कोई कपड़े बनाए। बंगाल की बहादुरी का वर्णन जब मैंने भी काँप उठेगा। जब पढ़ा तब मुझे हर्ष हुआ। बंगाल में कपड़े की मिलें नहीं मिलों की वर्षा नहीं हैं, इसलिए लोगों ने अपना असली धंधा फिर से हाथ हुई थी तब वे औरतें में ले लिया। बंगाल मुम्बई की मिलों को बढ़ावा देता भूखों नहीं मरती थीं। है वह ठीक ही है, लेकिन अगर बंगाल ने तमाम मशीनों से परहेज किया होता, उनका बहिष्कार किया होता तो और भी अच्छा होता। मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिन्दुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी हैं और वह महापाप है, ऐसा मैं तो साफ देख सकता हूँ। मुम्बई की मिलों में जो मजदूर काम करते हैं, वे गुलाम बन गये हैं, जो औरतें उनमें काम करती हैं, उनकी हालत देखकर कोई भी काँप उठेगा। जब मिलों की वर्षा नहीं हुई थी तब वे औरतें भूखों नहीं मरती थीं। मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली, तो हिन्दुस्तान की बुरी दशा होगी। मेरी बात आपको कुछ मुश्किल मालूम होती होगी, लेकिन मुझे कहना चाहिए कि हम हिन्दुस्तान में मिलें कायम करें, उसके बजाय हमारा भला इसी में है कि हम 135