भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 150 में से

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हिन्द स्वराज का शरीर बल आज़माते थे। आज तो तोप के एक गोले से हजारों जानें ली जा सकती हैं। यह सभ्यता की निशानी है। पहले लोग खुली हवा में अपने को ठीक लगे उतना काम स्वतन्त्रता से करते थे। अब हजारों आदमी अपने गुज़रे के लिए इकट्ठा होकर बड़े कारखानों में या खानों में काम करते हैं। उनकी हालत जानवर से भी बदतर हो गई है। उन्हें सीसे वगैरह के कारखानों में जान को जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है। इसका लाभ पैसेदार लोगों को मिलता है। पहले लोगों को मार- पीट कर गुलाम बनाया जाता था, आज लोगों को पैसे का और भोग का लालच देकर गुलाम पैगम्बर मोहम्मद साहब की बनाया जाता है। पहले जैसे रोग नहीं थे वैसे रोग सीख के मुताबिक यह आज लोगों में पैदा हो गये हैं और उसके साथ शैतानी सभ्यता है। हिन्दू धर्म डॉक्टर खोज करने लगे हैं कि ये रोग कैसे इसे निरा 'कलजुग' कहता मिटाए जाएँ। ऐसा करने से अस्पताल बढ़े हैं। है। मैं आपके सामने इस यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। पहले सभ्यता का हूबहू चित्र नहीं लोग पत्र लिखते थे तब खास क़ासिद उसे ले खींच सकता। यह मेरी जाता था और उसके लिए काफी खर्च लगता शक्ति के बाहर है, लेकिन था। आज मुझे किसी को गालियाँ देने के लिए आप समझ सकेंगे कि इस पत्र लिखना हो, तो एक पैसे में मैं गालियाँ दे सभ्यता के कारण अंग्रेज सकता हूँ, किसी को मुझे मुबारकबाद देना हो प्रजा में सड़न ने घर कर तो भी मैं उसी दाम में पत्र भेज सकता हूँ, यह लिया है। यह सभ्यता दूसरों सभ्यता की निशानी है। पहले लोग दो या तीन का नाश करने वाली और बार खाते थे और वह भी खुद हाथ से पकाई खुद नाशवान है। हुई रोटी और थोड़ी तरकारी। अब तो हर दो घंटे पर खाना चाहिए और वह यहाँ तक कि लोगों को खाने से फुरसत ही नहीं मिलती और कितना कहूँ? यह सब आप किसी भी पुस्तक में पढ़ सकते हैं। ये सब सभ्यता की सच्ची निशानियाँ मानी जाती हैं और अगर कोई भी इससे भिन्न बात समझाए, तो वह भोला है ऐसा निश्चय ही मानिये। सभ्यता तो मैंने जो बतायी वही मानी जाती है। उसमें नीति या धर्म की बात ही नहीं है। सभ्यता के हिमायती साफ कहते हैं कि उनका काम लोगों को धर्म सिखाने का नहीं है। धर्म तो ढोंग है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं और कुछ लोग धर्म का दंभ भरते हैं, नीति की बातें भी करते हैं। फिर भी मैं आपसे बीस बरस के 43