भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 150 में से

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पृष्ठ 48

हिन्दुस्तान कैसे गया ? पाठक : आपने सभ्यता के बारे में बहुत कुछ कहा और मुझे विचार में डाल दिया। अब तो मैं इस संकट में आ पड़ा हूँ कि यूरोप की प्रजा से मैं क्या लूँ? और क्या न लूँ? लेकिन एक सवाल मेरे मन में तुरन्त उठता है, अगर आज की सभ्यता बिगाड़ करने वाली है, एक रोग है, तो ऐसी सभ्यता में फँसे हुए अंग्रेज हिन्दुस्तान को कैसे ले सके ? इसमें वे कैसे रह सकते हैं ? संपादक : आपके इस सवाल का जवाब कुछ आसानी से दिया जा सकेगा और अब थोड़ी देर में हम स्वराज्य के बारे में भी विचार कर सकेंगे। आपके इस सवाल का जवाब अभी देना बाकी है, यह मैं भूला नहीं हूँ, लेकिन आपके आखिरी सवाल पर हम आयें। हिन्दुस्तान अंग्रेजों ने लिया सो बात नहीं है, बल्कि हमने उन्हें दिया है। हिन्दुस्तान में वे अपने बल से नहीं टिके हैं, बल्कि हमने उन्हें टिका रखा है। वह कैसे सो देखें। आपको मैं याद दिलाता हूँ कि हमारे देश में वे दरअसल व्यापार के लिए आए थे। आप अपनी कंपनी बहादुर को याद कीजिए। उसे बहादुर किसने बनाया ? वे बेचारे तो राज करने का इरादा भी नहीं हमारे देश में वे दरअसल व्यापार के लिए आये थे। आप अपनी कंपनी बहादुर को याद कीजिये। उसे बहादुर किसने बनाया ? वे बेचारे तो राज करने का इरादा भी नहीं रखते थे। कंपनी के लोगों की मदद किसने की ? उनकी चाँदी को देखकर कौन मोह में पड़ जाता था ? उनका माल कौन बेचता था ? इतिहास सबूत देता है कि यह सब हम ही करते थे। जल्दी पैसा पाने के मतलब से हम उनका स्वागत करते थे। रखते थे। कंपनी के लोगों की मदद किसने की? उनकी चाँदी को देखकर कौन मोह में पड़ जाता था? उनका माल कौन बेचता था? इतिहास सबूत देता है कि यह सब हम ही करते थे। जल्दी पैसा पाने के मतलब से हम उनका स्वागत करते थे। हम उनकी मदद करते थे। मुझे भाँग पीने की आदत हो और भाँग बेचने वाला मुझे भाँग बेचे, तो कुसूर बेचने वाले का निकालना चाहिए या अपना खुद का? बेचने वाले का 47