भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 150 में से

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पृष्ठ 60

हिन्दुस्तान की दशा-दो पाठक : हिन्दुस्तान की शान्ति के बारे में मेरा जो मोह था वह आपने ले लिया। अब तो याद नहीं आता कि आपने मेरे पास कुछ भी रहने दिया हो। संपादक : अब तक तो मैंने आपको सिर्फ धर्म की दशा का ही ख़्याल कराया है, लेकिन हिन्दुस्तान रंक क्यों है? इस बारे में मैं अपने विचार आपको बताऊंगा तब तो शायद आप मुझसे नफ़रत ही करेंगे, क्योंकि आज तक हमने और आपने जिन चीज़ों को लाभकारी माना है, वे मुझे तो नुकसानदेह ही मालूम होती हैं। पाठक : वे क्या हैं? अच्छा करने वाले के मन संपादक : हिन्दुस्तान को रेलों ने, वकीलों ने और में स्वार्थ नहीं रहता। वह डॉक्टरों ने कंगाल बना दिया है। यह एक ऐसी जल्दी नहीं करेगा। वह हालत है कि अगर हम समय पर नहीं चेतेंगे, तो जानता है कि आदमी पर चारों ओर से घिर कर बरबाद हो जाएँगे। अच्छी बात का असर पाठक : मुझे डर है कि हमारे विचार कभी मिलेंगे डालने में बहुत समय या नहीं! आपने तो जो कुछ अच्छा देखने में आया लगता है। बुरी बात ही है और अच्छा माना गया है, उसी पर धावा बोल तेजी से बढ़ सकती है। दिया है! अब बाकी क्या रहा ? घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सरल है। संपादक : आपको धीरज रखना होगा। सभ्यता नुकसान करने वाली कैसे है- यह तो मुश्किल से मालूम हो सकता है। डॉक्टर आपको बतलायेंगे कि क्षय का मरीज मौत के दिन तक भी जीने की आशा रखता है। क्षय का रोग बाहर दिखाई देने वाली हानि नहीं पहुँचाता और वह रोग आदमी को झूठी लाली देता है। इससे बीमार विश्वास में बहता रहता है और आखिर डूब जाता है। सभ्यता को भी ऐसा ही समझिये। वह एक अदृश्य रोग है। उससे चेतकर रहिये। पाठक : अच्छा, तो अब आप रेलपुराण सुनाइये। 59