भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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उठी और सारे मनुष्यों ने एक स्वर हो बदला लेने की आवाज़ उठायी। बालाजी और भाऊ ने अभी इसी सप्ताह उद्गीर के स्थान पर शानदार विजय प्राप्त की थी और चाहते थे कि हैदरअली को कुचल कर दक्खिन स्वतन्त्र करने का काम सम्पूर्ण कर दें। ठीक उसी समय दत्ताजी की पराजय और उनका मृत्यु-समाचार उनको मिला। उन लोगों ने समयोचित कार्य करने की तैयारी में एक क्षण भी देर नहीं की। यद्यपि उसी सप्ताह उन्होंने दक्षिण में एक बड़ा युद्ध किया था, तो भी एक दिन भी विश्राम न लेकर, अपने सेनापतियों और मन्त्रियों को पटदूर में इकट्ठे होने की आज्ञा दी और इस गम्भीर प्रश्न पर भली-भाँति विचार करके अब्दाली का सामना करने और उसके मालवा पहुँचने से पहले ही उससे लड़ने के लिये एक शक्तिशाली सेना भेजने का निश्चय किया। महाराष्ट्र- नवयुवक सेना में भरती हो गये। शमशेर बहादुर, विट्ठल शिवदेव, मानाजी घैरडे, अन्ताजी मनकेश्वर, मने, निम्बालकर तथा बहुत से अन्यान्य पुराने योद्धा और सेनापतियों ने फिर अपनी-अपनी बागडोर सम्भाली। उद्गीर-विजेता भाऊ सेनापति बनाया गया और बालाजी के ज्येष्ठ पुत्र नवयुवक राजकुमार विश्वासराव भी भाऊ के साथ गये। यह राजकुमार अभी उद्गीर में ख्याति पा चुका था और अपनी जाति का आशा-प्रदीप था। उस समय का विख्यात इब्राहीमखां गारदी, तोप- खाने का अध्यक्ष बनाया गया। दामाजी गायकव ड़ और सन्तोजी बाघ तथा अन्यान्य सेनापति क्रमशः आगे मिलाते गये। कई उत्तर भारतीय राजपूत राजाओं के यहां भी दूत और पत्र भेजे गये कि वे हिन्दुत्व के विरोधी तथा मथुरा गोकुल नष्ट करने वाले विधर्मियों के साथ युद्ध में उनको सहायता करें। विन्ध्याटवी और नर्मदा नदियों को पार करके मरहठा सेना चम्बल तक जा पहुँची। मरहठों की इस विशाल सेना और शक्ति को देखकर समस्त उत्तर भारत भयभीत और स्तम्भित हो गया। शत्रु भाव रखने वाले सब राव, राने, नवाब और खां साहबान हर