भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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नाना का गला भर आया और कहने लगे- "महाराज ! आपके जन्मकाल से ही नहीं; किन्तु इसके पहले से भी आपके अधिकारों और इस राज्य की भलाई के लिये मैंने लाखों मनुष्यों से शत्रुता उत्पन्न की । अब मेरी उन सेवाओं की गणना नहीं है और शत्रुओं की बात सुनी जाती है।" उदारचित्त नवयुवक इन बातों को सुन कर इतना दुःखी हुआ कि अपने राज्य के प्रधान और नाना के प्रधान-मन्त्री होने की सुधि भी उसे न रही और प्रेम से अधीर होने के कारण उसके गले में अपना हाथ डाल कर सिसकते हुये कहने लगा— "मेरा त्याग न कीजिये; दुःखित होने का कोई कारण नहीं है, आप न केवल मेरे प्रधान-मन्त्री ही हैं प्रत्युत् बालपन से आप ही मेरे पिता हैं। यदि मैं अपने मार्ग से पथ-भ्रष्ट हुआ हूँ तो उसके लिये क्षमा कीजिये। कदापि मैं तुम्हें अपने पद से त्याग-पत्र देने अथवा पृथक् होने की स्वीकृति नहीं दूँगा। मैं आजीवन आपको नहीं छोड़ सकता।" पेशवा के इन दयायुक्त विश्वासपूर्ण शब्दों से नाना, भाऊ, हरिपन्त फाडके तथा मन्त्री-मण्डल के अन्यान्य नेता सशक्त हुये और महादजी पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ा । वे भी विस्मित हो गये । चाहे व्यक्तिगत इच्छा जो कुछ भी रही हो, पर इसमें कुछ सन्देह नहीं कि महादजी हिन्दू-साम्राज्य के उतने ही बड़े भक्त और शुभचिन्तक थे जितना उनके कोई भी सहयोगी कार्यकर्त्ता वे सर्वदा अपने प्राण बलिदान करके उसे सर्वोपरि रखने में प्रयत्नशील रहने वाले थे । यह दादा राघोबा नहीं थे । यद्यपि उनका विचार महाराष्ट्र राज्य को अपने हाथ में रखने का था, पर वह कभी यह नहीं चाहते थे कि आपस में युद्ध हो । अतएव प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रिमण्डल के साथ सहमत हो पेशवा की इच्छानुसार चलने पर तैयार हो गये। इसी बीच में हरिपन्त फाडके इत्यादि ने उनको घेर कर सूचित किया कि आपकी, मन्त्रिमण्डल के समस्त अधिकारों को अपने हाथ में रखने की इच्छा के कारण, हम लोगों में प्रतिद्वन्दिता होने