हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १३ ] झगड़ों मे पैदा हुए रक्त-द्वारा सींचा जा चुका था, जिन्होंने अपने गृह- कलह के निपटारे के लिये मुसलमान और अङ्गरेजों को आमन्त्रित किया था, जिन्होंने वेदों को कुचलने वाले मुगलों के सामने अपना सिर झुकाना अपने भाइयों के सामने सिर झुकाने से श्रेष्ठ समझ रक्खा था, उन हिंदुओं से इस प्रकार की शुभ कामना की आशा रखना मूर्खता नहीं तो और क्या थी। साथ-ही-साथ जिस समय देश की राजनीति और राष्ट्रीय एकता इतनी नीच दशा को प्राप्त हो गई हो, उस समय किसी से ऐसी आशा करना कि वह सहसा राजनैतिक विचारों और भावों के उच्च शिखर पर पहुँच जायगा, भूल है। दूसरी बात यह है कि जिस कार्य के पूर्ण करने का भार सब लोगों के ऊपर बराबर है उसकी पूर्ति न करने के लिये अपने में से किसी एक व्यक्ति या जाति को दोषी ठहराना अन्याय ही नहीं बल्कि अनुचित भी है। यदि यह कहा जाय कि हिंदू-साम्राज्य के प्राप्त करने के आदर्श अच्छे नहीं थे तो इस दोष के अपराधी और उत्तरदायी भारतवर्ष के हिंदूमात्र हैं, न कि कोई व्यक्ति- विशेष या समुदाय विशेष। दूसरे इसके अधिक उत्तरदायी वे लोग हैं जिन्होंने हिंदू-पद-पादशाही के प्राप्त करने और परतन्त्रता की बेड़ी को चूर्ण करने में इतना भी नहीं किया जितना कि मरहठों ने कर दिखलाया था। यह भी कहा जा सकता कि हिंदू साम्राज्य स्थापित करने के लिये दूसरे हिंदुओं के पास जा कर उन से इस आंदोलन में भाग लेने के लिये बिल्कुल ही नहीं कहा गया। ऐसा किया गया और बहुत से देश- भक्तों ने इस पुकार को सुनकर इसमें भाग भी लिया। उत्तर और दक्षिण के कई एक राजपूत बुन्देला, जाट और दूसरे हिंदू भाई कार्यक्षेत्र में उतर पड़े। हम इस प्रकार के उदाहरणों का वर्णन पहले कर आये हैं और उनके विषय में अपनी टीका टिप्पणी भी लिख आये हैं, इसलिये उन्हे पुनः उद्धृत करके हम अपने पाठकों को उकताना उचित नहीं समझते। यदि राजनैतिक विचारों के विकास और शिक्षा को पूर्ण अवकाश