भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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जानते थे कि हिन्दुओं मे मरहठे सबसे अधिक शक्तिशाली हैं और दूसरों में इतना सामर्थ्य भी नहीं है कि विदेशियों के आक्रमणों को रोक कर इतने बड़े राज्य का प्रबन्ध कर सकें। इस लिये मरहठों के अधिकार के सम्बन्ध में उनका प्रश्न करना सर्वथा अनुचित था। इस प्रकार इन परिस्थितियों में यह परमावश्यक हो गया कि हिन्दुओं में जो सबसे शक्ति शाली हो वही हिन्दू-साम्राज्य का स्वामी बने परिणामतः हिन्दू-राजे हिन्दू-हित को दृष्टि में न रख कर, अपने स्वार्थवश, मरहठों से शक्तिहीन होने पर भी, हिन्दू-साम्राज्य-पति बनने की इच्छा करने लगे। उनसे मरहठों की लड़ाई अनिवार्य हो गई। राष्ट्रीय संगठन और राजनैतिक एकता के आन्दोलन को सफल बनाने के लिये, देशभक्ति की तरंग में उन्मत्त हो कर राष्ट्रीय हित के लिये, मनुष्य व्यक्तिगत हित की ओर ध्यान न दे कर कभी २ ऐसे भी कामों को करने के लिये विवश हो जाता है जो उसकी इच्छा के बिल्कुल विरुद्ध होते हैं। पहले मरहठों की बात ही लीजिये। वहां भी कुछ जमींदार, सरदार और राजकुमार ऐसे वर्तमान थे जो कि दासता की बेड़ी को काटने के लिये उत्सुक थे और कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें दासता की दशा में पड़े रहने में ही आनन्द आता था। जब महाराज शिवाजी ने महाराष्ट्र के संगठन का कार्य प्रारम्भ किया तब ये दोनों ही प्रकार के लोग उनके और उनके साथियों के विरोध में उठ खड़े हुए क्योंकि इन्हें शिवाजी की नीयत के सम्बन्ध में विश्वास नहीं था। बाद को ये लोग यह कहने लगे कि राष्ट्रीय संगठन और हिन्दू एकता के बहाने भोंसला स्वयं बड़ा बनना चाहता है। वे लोग बहुधा यह प्रश्न किया करते थे कि यदि शिवाजी की वास्तव में यही इच्छा थी कि एक हिन्दू- राज्य स्थापित हो तो उन्हों ने स्वयं किसी दूसरे राजा को महाराजा स्वीकार करके उसकी अधीनता में क्यों नहीं काम किया । यदि भोंसला का भी यह उद्देश्य है तो वह हमारे अधीन क्यों नहीं हो जाता, हम ही