हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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शिक्षा के केन्द्र बन गईं और हिन्दू विद्वानों और विद्यार्थियों का संरक्षण करने लगीं, तथा पाठशालाओं और महाविद्यालयों की स्थापना करके उनको सुचारु रूप से चलाने लगीं। धार्मिक शिक्षा की ओर भी पूर्ण ध्यान दिया जाता था। साधु सन्त स्वेच्छापूर्वक मरहटों द्वारा सुरक्षित रह कर हरिद्वार से रामेश्वर और द्वारिका से जगन्नाथ तक स्त्री पुरुषों को हिन्दू धर्म, हिन्दू-दर्शन और पुराणों की शिक्षा देते हुए भयरहित भ्रमण करते थे। इनके पालन और सहायता के लिये और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये राजे, वाइसराय, गवर्नर और सैनिक बराबर ध्यान देते थे। स्वामी रामदास जी के स्थापित किये गए मठों के अनुरूप देश में बहुत से मठ स्थापित हो गए, जिनकी रक्षा का भार राज्य के सिर पर था और उन मठों के द्वारा राजनैतिक और धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार होता था। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष श्रावण में भारतवर्ष के सारे विद्वान पूना में एकत्र हुआ करते थे और पेशवा की संरक्षता में उनकी विद्याओं की परीक्षा हुआ करती थी। लोगों को पद, पुरस्कार दिये जाते थे और योग्य विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति भी दी जाती थी। हिन्दू धर्म की शिक्षा के प्रोत्साहन और इनामों के लिए हर वर्ष इस अवसर पर १०,००,००० रुपये से कम व्यय नहीं किया जाता था। इस प्रकार विद्वानों के एकत्र हो जाने से यह लाभ होता था कि लोगों के भिन्न २ विचार और धार्मिक सिद्धान्त एक दूसरे में परि- वर्तित हो जाया करते थे और फिर सर्वसाधारण में फैल जाते थे। लोग यह अनुभव करने लग जाते थे कि यद्यपि हमारे भीतर धार्मिक और जातीय विभिन्नतायें हैं किन्तु फिर भी हम सब हिन्दू हैं और एक राष्ट्रीय ध्वजा के नीचे एकत्र हुए हैं, जिस ने शत्रुओं का नाश कर दिया है और जो हमारे देश, धर्म और सभ्यता की हर प्रकार से रक्षा कर रही है। सर्वसाधारण के हित के कामो पर भी पेशवा और इस के अधिकारी-वर्ग उचित ध्यान देते थे। यदि कटक और रामेश्वर से कर