हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ३८ ] कारण हिन्दुओं की जाति तथा धर्म का नाश हुआ था। इसी बात को दृष्टि में रख कर वे सदैव यह प्रयत्न करते रहे कि जहां तक सम्भव हो, हिन्दूमात्र को संगठित किया जावे। इसी बात को ध्यान में रखकर जिस समय नादिरशाह का आक्रमण भारतवर्ष पर हुआ उस समय बाजीराव ने प्रत्येक हिन्दू-राजा को लिख भेजा था कि मैं आप लोगों को केवल अपने धार्मिक तथा राजनैतिक कार्यों के लिये स्वार्थवश नादिरशाह का सामना करने में सहयोग देने के लिये विवश नहीं करता हूं, बल्कि मैं सोचता हूं कि जब तक आप लोग इस महान हिन्दू जाति की स्वतंत्रता के प्रश्न को सुचारू रूप से हल न करेंगे तब तक आप लोगों का व्यक्तिगत जीवन वास्तविक शान्तिमय जीवन नहीं कहलायेगा। आप को अपने ही सुख भोग पर जीवन व्यतीत करना शोभा नहीं देता है, वरन हम लोगों को एक ऐसा बड़ा राज्य स्थापित करना चाहिये जिस की छत्र-छाया में सारा भारतवर्ष सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सके। यह बात निश्चित है कि जब तक भारत पर विदेशियों का शासन है तब तक कोई भी हिन्दू शान्तिपूर्वक नहीं रह सकता और न ही अपने को पूर्ण हिन्दू कहलाने के योग्य भी प्रमाणित कर सकता है। ऐसी अवस्था में वह अपनी जाति की उन्नति करने में भी असमर्थ होंगे, क्योंकि दूसरों के अन्याय से भयभीत होकर उन्हें सब प्रकार से गुलामी की बेड़ी में बंधा रहने के लिये विवश होना पड़ेगा। इन सब बातों को केवल महाराष्ट्र के प्रमुख नेता ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र का साधारण से साधारण व्यक्ति भी अनुभव कर रहा था कि जब तक वे लोग दिल्ली पर राज्य न करेंगे तबतक पूना और सितारे में राज्य करना व्यर्थ है। जब महाराष्ट्र के सारे नेता, शाहूजी के सभाप- तित्व में उपस्थित होकर भविष्य के राजनैतिक सिद्धान्तों पर विचार करने के लिये एकत्रित हुए तो ऐसा सुअवसर पाकर बाजीराव बोलने के लिए उठे और अपनी शक्ति और उत्साह तथा अपने विषय के महत्त्व को दृष्टि