भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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रचनाओं के अन्त में अपने मतभेद और स्वतन्त्र विचार भी लिख दे । परन्तु इतिहास की घटनाओं को ज्यूं का त्यूं ही लिखना चाहिए । यदि वह ऐसा न कर सके तो बेहतर है कि वह मुहम्मद का जीवन ही न लिखने बैठे । ठीक इसी तरह उसके पाठकों का भी एक कर्त्तव्य है और विशेषकर उन पाठकों का जिन्हें मुहम्मद की शिक्षाओं पर कोई आस्था नहीं । पाठकों को यह भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए कि मुहम्मद, बावर अथवा औरंगजेब की अच्छी-बुरी आकांक्षाओं, भावनाओं और कारनामों का यथारूप चित्रण करने वाला लेखक, आज का अच्छा नागरिक नहीं हो सकता । सम्भवतया वह लेखक अपने देश के अन्य धर्मावलम्बियों के प्रति बहुत उदार और सहिष्णु हो । हिन्दू इतिहास के उस काल का वर्णन करते हुए जब कि हिन्दू, मुसलमान शक्तियों के साथ जीवन और मरण के भीषण संघर्ष में उलझे हुए थे, हम- एक सच्चे लेखक के आदर्श से नहीं गिरे । सभी घटनाओं के कारणों की निष्पक्ष खोज की है और जहां तक बन पड़ा है घटनाओं के पात्रों के भावों को उनके अपने शब्दों द्वारा ही व्यक्त किया है । परन्तु इससे मुसलमानों को लेखक पर यह दोषारोपण नहीं करना चाहिए कि उसके हृदय में उनके प्रति कोई द्वेषभाव है ।' हालांकि यह इतिहास के उस भाग का विश्लेषण है जबकि मुसलमानों के पूर्वजों के प्रति हिन्दुओं ने एक भारी आवाज़ उठाई और एक ऐसी ज़बरदस्त टक्कर ली, जिसे लेखक न्यायपूर्ण समझता है । बीती बातों और पुरानी शत्रुताओं के आधार पर आज भी लड़ते रहना उतना ही हास्यास्पद है और घातक भी, जितना कि हिन्दू और मुसलमान आपस में गले मिलते हुए केवल इसलिए एक दूसरे को मारने का दाँव करें क्योंकि आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व शिवाजी और अफ़ज़लखान ने ऐसा किया था । इतिहास का मनन इसलिये नहीं करना चाहिये कि हम पुराने झगड़े और फ़साद को चिरस्थायी रखने के लिये कोई कारण ढूँढ निकालें और आज भी 'मातृभूमि' या 'खुदा' के नाम पर खून की नदियाँ