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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • ६५ भगवत यह रस रीति प्रकट परिपूरन ससमा। प्रेम पियूष न स्रवै भाव रूपी बिनु चसमा॥ इस तरह भाव चश्मे के द्वारा निकुञ्ज की ओर ताकने की दृष्टि ही कुछ और है जो शब्दों के अर्थ बदलने से कदापि सिद्ध नहीं है। — २० — अवतरण — आज निभृत निकुञ्ज में रस मूर्त्ति श्रीराधा अपने प्रियतम रसिक शेखर श्रीलालजी से मिली हैं। उनके श्रीअङ्गों में मिलन रति रस की सूचना देने वाले अनेकों चिह्न प्रकट हैं। चतुर श्रीराधा अपनी अन्तरङ्गा हित सजनी पर भी आज अपने विहार का प्रकाश नहीं होने देना चाहतीं अतः रति चिह्नों को छिपाती हैं। यह सङ्कोपन क्यों है ? प्रथम स्नेह है न ! जो कि स्वाभाविक भी है। श्रीराधा के इस दुराव को लखकर हित सखि को कुछ परिहास सा सूझ पड़ा। वे हँसती मुसकाती सी रति विमर्दिता श्रीराधा से बोलीं— धनाश्री मूल— मोहन लाल के रस माती। बधू गुपति गोवति कत मोसों, प्रथम नेह सकुचाती॥ देखि सँभार पीत पट ऊपर कहाँ चूनरी राती। टूटी लर लटकति मोतिनु की नख विधु अंकित छाती॥ अधर बिंब खंडित, मषि मंडित गंड, चलति अरुझाती। अरुन नैन घूमत आलस जुत कुसुम गलित लट पाती॥ आजु रहसि मोंहन सब लूटी विविध . आपनी थाती। (जै श्री) हित हरिवंश वचन सुनि भामिनि भवन चली मुसकाती॥२०॥ भावार्थ— [“हे राधे ! तू] मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे बधू ! उस (एकान्त मिलन की) गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण सङ्कोच है ! अरी ! जरा सम्हाल कर देख तेरे शरीर पर तो पीताम्बर है और (जाने) रँगदार चूनरी कहाँ गयी ? हृदय पर (एक तो) मोतियों की टूटी लड़ लटक रही है, (दूसरे) वक्षस्थल नख चन्द्रों से अङ्कित है।