हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० • • हित चौरासी टिप्पणी- 'चंचल चपल' इस पद में स्वाभाविक ही एक आशङ्का का विषय है कि श्रीहिताचार्य्य पाद ने 'चंचल चपल' इन दो समानार्थी शब्दों का एक ही स्थल पर केवल एक विशेष्य नयन के लिये विशेषण रूप में कैसे और क्यों प्रयोग किया ? बहुत थोड़े में इसका उत्तर है। इसे सब जानते हैं कि शास्त्र, सन्त, महापुरुष कवि या विद्वान् जन कवि भी भाषा साहित्य के शब्दों और उनके अर्थों को तौल तौल कर अपना आशय नहीं प्रकट किया करते। वे अपनी खुद मस्ती में जो कुछ कह जाते हैं वह उचित, योग्य और पत्थर की लकीर हो रहता है उनकी वाणी मानवीय व्यक्तित्व से बहुत ऊपर उठी हुई रहती है और रहती है नित्य निरतिशय सत्य। उनकी वाणियों के पीछे अर्थ और भावों की अनेकों सृष्टियाँ बनती रहती हैं अर्थात् उनके पीछे अर्थ चलता है। वे वाणियाँ अर्थ के पीछे कदापि नहीं चलतीं। देखिये, महात्मा कबीर जाने किस मस्ती में एक पहेली सी बूझ गये- एक अचम्भा हमने देखा कुएँ में लग गई आग। पानी पानी जल गया और मछली खेलें फाग।। कितना अचम्भा है कुए में आग लग गयी, पानी पानी सब जल गया और मछली बच गयीं, पानी से विछुड़कर अपने प्राण जीवन से अलग रह कर भी फाग खेल रही हैं आनन्दित हैं ? यह हैं महात्माओं की खुद मस्ती के वाक्य, जो गलत नहीं, निरे पागल पन के नहीं। भले ही कोई इन्हें प्रलाप कह दे पर ये वाक्य पूर्ण सार्थक हैं। हाँ संसार-शब्द संसार की प्रवचन शैली से अवश्य ही ये विलक्षण हैं। उन्होंने स्वयं ही अचम्भे की पहेली बूझी है अब लोग उसके अर्थ लगाया करें। अस्तु; ऐसे ही श्रीहिताचार्य्य चरण ने एक पहेली रख दी- अधर अरुन तेरे कैसे कैं दुराऊँ ? रवि ससि संक भजन किये अपबस, अद्भुत रंगनि कुसुम बनाऊँ।।