भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

१०४ • • हित चौरासी सगुण और निर्गुण सगुण से परे भी है। सर्वत्र सब रूपों में केवल वही है। वृन्दावन विहार के विविध रूप मय परिकर का भी एक ही रूप है, हित। या यों कह दें कि एक ही खाँड़ के अनन्त खिलौने हैं, एक ही स्वर्ण के नाना आभूषण हैं। इसी बात को रसिकाचार्य्य कहते हैं- श्रीराधा हित रूपा हि श्रीकृष्णो हित रूपकः। ललिताद्या हित रूपा श्रीमद्धामं च हितमयम्॥ यमुना च हित रूपा च निकुञ्ज हित रूपकम्। शय्या च हित रूपा वै विहारं हित मयं विदुः॥ हितेन प्राप्यते राधा हितेव सखि यूथपा। हितेन प्राप्यते धाम हितेनैव रसज्ञता॥ यत्किञ्चित दृश्यते सृष्टौ हितमयं सर्वमेव हि। तस्मात् विवेक निपुणैरूपास्यो हित चन्द्रमा॥ अर्थात् “निश्चय है कि श्रीराधा हित रूपा हैं और श्रीकृष्ण भी हित रूप हैं। इसीप्रकार श्रीयमुना हित रूपा है, निकुञ्ज भवन भी हित रूप है और शय्या हित रूपा है, उनका विहार भी हित रूप ही है ऐसा जानना चाहिये इस हित के द्वारा ही श्रीराधा की प्राप्ति होती है और इसी हितोपासना से सखियों की यूथेश्वरी (ललिता) की। हित से ही श्रीधाम वृन्दावन मिलता है एवं हित के द्वारा ही हित की रसज्ञता, (हित विलास के रसास्वादन की पात्रता।) कहाँ तक कहा जाय यावन्मात्र जो कुछ दृश्य अदृश्य सृष्टि देखी, सुनी कही जाती है निश्चयेन सभी हित है-केवल प्रेम। इसलिये विवेक निपुण व्यक्ति के लिये उपास्य तत्व केवल हित रूप चन्द्रमा ही है, अन्य कोई नहीं।” इस प्रकार निज-हित रूपा श्रीराधा अपने निज रूप हित श्रीकृष्ण को निजु भजन हित आराधना (प्रेम भजन) से ही वशवर्त्ती किये हुए हैं। – २४ – अवतरण – शरत्काल की शीतल एवं उज्ज्वल रात्रि में युगल किशोर प्रिया प्रियतम ने अपनी समस्त सखियों के साथ रास नृत्य की योजना की है। वे सभी नृत्य में संलग्न हैं। आज श्रीवृन्दावन भी नवीन शोभा को धारण किये