हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • १५ श्रीनेही नागरीदास जी गिरा गंभीर गुननि गरबीली। सुजन सनेहिन के मन आवै, औरन कौ ओरठ अरबीली।। श्री हरिवंश वचन वर कल, कढ़ी स्वच्छ सुछंद सुछैल छबीली। नागरीदास मकरंद माधुरी रूप रंग रस रसिनि रसीली।। वानी विमल लाड़ की परावधि। श्री हरिवंश वचन वर निकसी बड़भागिनु जो आवै कहाँ सधि।। रूप रंग रस कुसल कुलाहल जामहि अमित-अगाध लवधि लधि। नागरिदास भजन कौ मरमी सुख निधि-व्याससुवन पद आरधि।। श्री हरिवंश गिरा पद अष्टक। कहत सुनत ताकौ मन सुधरै कपटी होइ कुटिल खलु निष्टक।। प्रबल प्रताप ध्वंस असुभ निकर रहत न पावै कंटक किष्टक। सदगद नागरीदास रसिक मनि कैसेहूँ करि-रमै मिटै मति भिष्टक।। श्री किशोरी अलीजी जय श्री चतुरासी रस रासी। हित हरिवंश चन्द्र तैं प्रगटी दम्पति-प्रेम प्रकासी।। ललित केलि की सरिता मानौं उमड़ि चली अनयासी। रसिक उपासक रुचि सौं पीवत जीवत श्रीवन बासी।। वक्ता-श्रोता कौ अपनावै नवल निकुंज विलासी। ताही छिन परिकर तन दैकै करत किशोरी दासी।। श्रीहित कल्याण पुजारी जी श्री हरिवंश गिरा घन बरसै। प्रेमी रसिक उपासक सींचे, सरस सुजस मन करषै।। छिन-छिन चौप कोंप उर बाढ़ति, भजन भावना हरषै। यह 'कल्याण' प्रेम जल उमग्यौ, नेम-मरजादनि न रखै।।