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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 275 में से

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हित चौरासी • • १५५ इश्क पर जोर नहीं यह वो आतिश 'गालिब'। जो लगाये न लगे और बुझाये न बुझे॥ अहा ! क्या ही सुन्दर? जो लगाये न लगे और बुझाये न बुझे। तात्पर्य यह कि प्रेम साधन से प्राप्त नहीं होता, अपने आप प्रकट होता है और प्रकट होने के पश्चात् उसका तिरोभाव भी नहीं होता। महात्मा कबीरदासजी कहते हैं- प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा परजा जेहि रुचै सीस देय लै जाय॥ प्रेम किसे कहते हैं ? छिनहिं चढ़ै छिन ऊतरै, सो तो प्रेम न होय। अघट प्रेम पिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय॥ —कबीर देवर्षि नारद भी अपने प्रेम दर्शन (भक्ति सूत्र) में कुछ ऐसा ही कह रहे हैं- प्रकाशते क्वापि पात्रे सूत्र ५३ अर्थात् 'यह प्रेम किसी विरले (योग्य) पात्र में ही प्रकट होता है।' वह प्रेम प्रतिक्षण वर्द्धन शील है- प्रतिक्षण वर्द्धमानम् सूक्ष्मतर सूक्ष्ममनुभव रूपम्। —नारद भक्ति सूत्र ५४ अर्थात् 'यह प्रेम प्रत्येक क्षण बढ़ने वाला, सूक्ष्म से सूक्ष्म और अनुभव रूप है।' जिस किसी भाग्यशाली के हृदय में इन प्रेम भगवान् का उदय होता है उसका हृदय उसके वश का नहीं रह जाता, वह तो सर्वथा प्रेम के अधीन हो जाता है। वह प्रेमी नाद मुग्ध मृग एवं दीपक आसक्त शलभ की तरह अपने प्रेमास्पद पर मर मिटने के लिये तत्पर रहता है प्रतिक्षण, प्रसन्नता पूर्वक। प्रियतम से एकाकार होने के पूर्व जितने क्षण जुदाई के बीतते हैं वास्तव में वही

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