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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

हित चौरासी • • १५७ 'मार्ग-अपमार्ग' का भेद उठाकर श्रीहिताचार्य्य पाद प्रेमी का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। – ४३ – अवतरण—मानवती श्रीप्रियाजी को मना कर ले आने के लिये श्रीलालजी अपनी निज सखी हित सजनी दूतिका से चिरौरी कर रहे हैं। किसी कारण वश आज पुनः श्रीप्रियाजी रूठ गयी हैं; इसलिये प्रियतम उनके वियोग में अत्यन्त व्याकुल हैं। प्रियतम सखी को अपनी प्रियतमा के समीप भेज रहे हैं; क्योंकि उन्हें अच्छी तरह विदित है कि भले ही वे इस समय मान किये बैठी हैं पर उनका स्वभाव कोमल है, वे भोली हैं। यही बात उन्होंने दूतिका को समझायी है। श्रीलालजी इस पद में दूतिका से कह रहे हैं- सारङ्ग मूल-अति नागरि वृषभानु किसोरी। सुनि दूतिका चपल मृगनैनी, आकरषत चितवत चित गोरी।। श्रीफ़ल उरज कंचन सी देही, कटि केहरि गुन सिंधु झकोरी। बैंनी भुजंग चंद्र सत वदनी, कदलि जंघ जलचर गति चोरी।। सुनि 'हरिवंश' आजु रजनी मुख, बन मिलाइ मेरी निज जोरी। जद्दपि मान समेत भामिनी, सुनि कत रहत भली जिय भोरी।।४३।। भावार्थ- (श्रीलालजी ने कहा-) “हे दूतिके ! सुन; वृषभानु किशोरी अत्यन्त चतुर है; जब वह चपल मृगलोचनि गोरी अपने मनोहर नेत्रों से अवलोकन करती है तो मानो उसी क्षण-देखते ही चित्त का आकर्षण कर लेती है। उस नागरी की देह प्रभा स्वर्ण की सी है तथा उरोज हैं श्रीफल की भाँति। कटि सिंह जैसी है और (उसमें इतने गुण हैं) मानो वह गुण रूप समुद्र में अच्छी तरह सराबोर की हुई है। उस शत शत चन्द्र जैसे मुखमयी-शत मयङ्क मुखी वेणी क्या है; मानो भुजङ्ग ! (चिकनी-चिकनी) कदली जैसी जङ्घाएँ है और चरणों में ऐसी गति है मानो उसने जलचर-हंस की चाल ही छीन ली है।” हे हरिवंश दूतिके ! (ध्यान पूर्वक) सुन ! आज संध्या समय मेरी अपनी जोड़ी (अत्यन्त अन्तरङ्ग प्रिया आत्म स्वरूपा श्रीराधा) को वन में अवश्य ही