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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

हित चौरासी • • १६३ ज्ञात होता रहता है। वे (पत्र प्रसूनों के प्रतिबम्ब पर प्रकट प्रिया प्रतिबिम्ब को देखकर भी) सङ्कोच वश प्रकट रूप से परिरम्भण कर नहीं सकते तब रस लम्पट भ्रमर (अलि) का रूप धारण कर छिप छिप कर दौड़ते हैं; (उनके श्रीमुख कमल के रस का पान करने के लिये) किन्तु सुन्दरी कामिनि (श्रीराधा) चञ्चलता पूर्वक चमक कर उन्हें फिर फिर विशेष भ्रम में डाल देती है इस प्रकार निरन्तर एक) रति रण का कलह मचा रही है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु सखी रूप से अपनी सहचरियों के प्रति) कहते हैं–"सखियो ! (आज श्याम सुन्दर की आँखे प्रिया रूप की वास्तविकता को पहचानने में बड़ा धोखा खा रही हैं, अतः वे) अपनी सारी समझों को उलटी (विपरीत) ही मानकर (आँखों के भ्रम को मिटाने के लिये कि जाने इनमें ही कोई त्रटि तो नहीं है, अपनी) आँखों में अञ्जन रेखा बनाते हैं। इसी से हे सजनी स्पष्ट है कि प्रीति-रीति वश स्याम यही (ऐसी ही भाव मग्नश्याम) कहलाता है (कि जिसे अपने समक्ष दर्शन पर भी विश्वास न होकर भ्रम हो रहा है।") टिप्पणी–"उलटी सबै समुझि" इन अन्तिम दो पंक्तियों का अर्थ दूसरे प्रकार से यों भी हो सकता है– सम्भ्रम के अवसर में सखियों न श्रीप्रिया रूप के पहिचानने में श्रीलालजी की कोई सहायता नहीं की, अतः उन्होंने निश्चय कर लिया कि ये सब मेरे उलटी (विपरीत) हैं और श्रीप्रियाजी की पक्षपाती हैं। इसलिये अब मेरे लिये यही उचित है कि मैं भी अब पुरुष का रूप परित्याग करके 'सजनी' बन जाऊँ; तो सम्भव है कि सादृश्यता के कारण इन सबके हृदय में मेरे प्रति सहानुभूति के भाव उदय हो जायें। ऐसा विचार कर श्रीलालजी अञ्जन लगाकर तत्काल 'सजनी' बन गये। – ४८ – अवतरण–श्रीवृन्दावन की नित्य रास स्थली है। वहाँ रास नृत्य परायण युगल किशोर शोभा पा रहे हैं। रास नृत्य में श्री किशोरी जी की अभूत पूर्व छवि प्रकट हो रही है जिसका वर्णन श्रीहित सखीजी कर रही हैं अपनी सखियों से–