हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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इसका वर्णन भी रस आस्वादनार्थ किंवा रस वर्णन के लिये है कोई व्रज लीला वर्णन इसका लक्ष्य नहीं। यह तो निर्विवाद है कि लक्ष्य की गति पर से ही वर्णन की गति जानी जाती है। अब यहाँ यह जानना चाहिये कि महारास का वर्णन होने पर भी इस पद में रस का ही वर्णन है। श्रीहिताचार्य्य पाद ने श्रीमद्भागवत में से भी अपनी इष्ट वस्तु रस कैसे और कहाँ से खोज निकाली है ? उसे देखिये, यहाँ प्रसङ्गानुसार यथा क्रम श्रीमद्भागवत से इस पद के भावों का सामञ्जस्य प्रकट किया जाता है- (१) 'मौंहन बैंनु बजावै' इस भाव का प्रकाश निम्न चरण से मिलता है- जगौ कलं वाम दृशां मनोहरम्। श्रीमद्भागवत १०/२९/३ अर्थात् "वंशी में वाम दृशा गोपियों के मन का हरण करने वाला गीत (श्याम सुन्दर ने) गाया।" जिसे सुनकर ब्रज बालाएँ आ गयीं। (२) "आईं व्रज नारि सुनत वंसी रव" अब इसका भाव साम्य श्रीमद्भागवत में किस प्रकार है उसे देखिये- निशम्य गीतं तदनङ्ग वर्द्धनं व्रजस्त्रियः कृष्ण गृहीत मानसाः। आजग्मु रन्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जव लोल कुण्डलाः॥ १०/२९/४ अर्थात् "उस कामोद्दीप गान के कान में पड़ते ही समस्त व्रज बालाएँ श्रीकृष्ण में आसक्त चित्त होकर एक दूसरे से अपनी चेष्टा छिपाती हुईं अपने कान्त के पास आयीं। उस समय अत्यन्त वेग के कारण उनके कानों के कुण्डल हिलते जाते थे।" इस आगमन के समय उन व्रज बालाओं को उनके भ्राता, पति, बन्धु वर्गों ने रोका तो सही पर वे किसी प्रकार भी न रुकीं। उनकी अवहेलना करके भी श्रीकृष्ण से जा मिलीं। आचार्य्य पाद कहते हैं-