हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 264, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें२५८ • • हित चौरासी टिप्पणी- "......पिवत सुंदरवर सींव सुदृढ़ निगमनि की तोरी राजा परीक्षित के प्रश्न-धर्म स्थापना के लिये अवतरित होकर भी भगवान् श्रीकृष्ण ने रास-क्रीड़ा जैसा जुगुप्सित कर्म क्यों किया ?-पर शुकदेव जी ने एक ही उत्तर दिया था- धर्म व्यत्तिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। श्रीमद्भागवत-१०/३३/३० अर्थात् "धर्म के उल्लङ्घन कर देने की सामर्थ्य ईश्वर में है।" क्योंकि सारी मर्यादाएँ उन्हीं की स्थापित की हुई हैं न ! इस सिद्धान्त के अनुसार नित्य विहारी श्रीराधावल्लभ लालजी की भी क्रीड़ा समस्त वेद उपनिषद्, शास्त्र एवं पुराणों की मर्यादाओं से अतीत है, एक दम परे है। जैसा कि सन्त महानुभाव गण कहते हैं- (१) अलक्ष्यं राधारव्यं निखिल निगमैरप्यतितरां, रसाम्भोधेः सारं किमपि सुकुमारं विजयते। -श्रीहित हरिवंशचन्द रसिकाचार्य अर्थात् "समस्त वेदों के शिरोभूषण उपनिषदों से भी अलक्षित राधा नामक जो एक तत्व है, उस परम रस सागर सार रूप अनिवर्चनीय किन्हीं सुकुमारी की जय हो। (२) आगम निगम अगोचर राधे चरन सरोज व्यास अवतंस। श्रीहरिराम जी 'व्यास' (३) पाई रस भक्ति गूढ़ जुग जुग जग दुर्लभ भव इन्द्रादि विधिम्। आगम अरु निगम पुरान अगोचर सहज माधुरी रूप निधिम्।। एवं- निगम लोक मरजाद भंजि क्रीडन्त रंग रस। -श्रीदामोदर 'सेवक जी' (४) अमग निगम की कौन चलावै। महाविष्णु के मन नहिं आवै।। -श्रीहित ध्रुवदासजी