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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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२८ • • हित चौरासी इन श्रीराधा ने श्रीकृष्ण को निरन्तर अपने वश में कर रखा है। श्रीकृष्ण सदा इनके प्रति चाटुकारी करते रहते हैं, प्रार्थना एवं स्तुति करते हैं और बार-बार उनके चरणों में लोट जाते हैं- केनापि नागर वरेण पदे निपत्य संप्रार्थितैक परिरम्भ रसोत्सवायाः। सभ्रूविभङ्गमतिरङ्गनिधेः ............... ।। श्रीराधा सु. ९ अर्थात् "हे राधिके ! कोई चतुर शिरोमणि किशोर आपके श्रीचरणों में बारम्बार गिरकर आपसे परिरम्भण सुखोत्सव की याचना कर रहे हों....।" और किंचैकं बहु मान भङ्गि रसवच्चाटूनि कुर्वत् परम्। अर्थात् "एक (श्रीकृष्ण) रस पूर्ण वचनों के द्वारा चाटुकारी परायण हैं और दूसरी (श्रीराधा) अत्यन्त मानभङ्गिमा युक्त।" इसी प्रकार कालिन्दी तट कुञ्ज मन्दिर गतो योगीन्द्र वद्यत्पद- ज्योतिर्ध्यान परः सदा जपति यां प्रेमाश्रु पूर्णो हरिः। श्रीराधा सुधा निधि ९५ अर्थात् "योगीन्द्रों के समान जिनकी चरण ज्योति के ध्यान परायण होकर प्रेमाश्रु पूर्ण नेत्र तथा गद्गद् वाणी से कालिन्दी तट के किसी निकुञ्ज मन्दिर में विराजमान् श्रीहरि भी स्वय जिस राधा नाम का जप करते हैं।" इतना ही नहीं श्रीकृष्ण तो सदैव श्रीराधा कृपा की वाञ्छा करते रहते हैं- नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं। (जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि भावै सो करहु प्रेम के नातैं।।

  • हित चौरासी, पद सं ७३ भाव यह है कि श्रीकृष्ण के हृदय में यह लालसा शेष ही रही आती है कि मेरी स्वामिनी ने कभी प्रसन्नता एवं कृपा पूर्ण दृष्टि से मेरी ओर नहीं देखा।