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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 275 में से

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पृष्ठ 40

हित चौरासी • • ३५ ऐसी परम सुन्दरी श्रीराधा कालिन्दी-कूल वर्त्ती कल्पद्रुम तल भवन में होने वाली केलि-विलास-कला की मूल स्वरूपा हैं। ये एकान्त सहचरी ललितादिकों के भी भावों से परम अगम्य हैं तथा घनीभूत आनन्द की मूर्त्ति तो हैं ही पूर्ण एवं अभिनव प्रेम लक्ष्मी भी हैं। ये प्रेम-लक्ष्मी श्रीराधा श्रीकृष्ण के अधर रस का पान करके सदा उन्मत्त बनी रहती हैं। इनकी पद नखच्छटा का लव मात्र ही समस्त श्यामा-रमणी मण्डल का जीवन है। केलि विभव पूर्ण विलास मूर्त्ति होने के साथ-साथ अधिकाधिक उन्मीलित महामाधुरी के प्रवाह सम्पतन को धारण करने में पूर्ण समर्थ हैं। अतएव माधुर्य्य साम्राज्य की एक मात्र भूमि और रस की एक मात्र सीमा है। इनके अंग-अंग से उज्ज्वल प्रेम रस, लावण्य, महानतम कृपापूर्ण वात्सल्य सार की धाराम्बुधियाँ प्रवाहित होती रहती हैं श्रीराधा वेदों की हृदय-धन-वह संगुप्त निधि हैं कि जिनकी किंचित चरण-कृपा से समस्त श्रुत-अश्रुत विभव तुच्छ होकर मुक्ति भी तुच्छ प्रतीत होने लगती है। इन्होंने अपने किञ्चित-केलि-विलास पूर्ण कटाक्ष से वृन्दा-विपिन कलभेन्द्र श्रीश्यामसुन्दर को अपना आज्ञा वशवर्त्ती जड़ीभूत क्रीड़ामृग सा बना रखा है; इसीसे आप गोपेन्द्र-कुमार श्रीकृष्ण की सम्मोहन विद्या हैं क्योंकि इनके नेत्र प्रान्त से माधुरी सार का मानो प्रवाह निरन्तर प्रवाहित होता रहता है। ये मद-अरुण विलोचना श्रीराधा सदा ही प्रणय-माधुरी के रस विलास के लिये उल्लास पूर्ण रही आती हैं और सदा नवीन वयः श्री एवं ललित भाव भङ्गिमा को धारण किये रहते हैं। श्रीराधा के श्रीसम्पन्न अधरों से नव नव सुधा माधुरी के कोटि-कोटि प्रवाह प्रवाहित होते रहते हैं। नेत्र कोणों से पुष्प-धन्वा कामदेव के कोटि कोटि प्रचण्ड शर बिखरते रहते हैं। श्रीवक्षोज से अति प्रमत्त रति-कला का सार सर्वस्व भी शोभा प्राप्त किया करता है। और श्रीचरणों से कोटि-कोटि प्रेम पीयूष प्रवाह निरवधि रूप से प्रवाहिंत होते रहते हैं। श्रीराधा के लास्य गति पूर्ण इन श्रीचरणों में श्रीहरि के कर कमलों से अलक्तक रस रंजित किया जाता है। ये श्रीचरण अनेक विदग्धा गोप रमणियों द्वारा और श्रीहरि के द्वारा वन्दित हैं। महाप्रेम मयी, एवं उन्मद मदन रसमयी श्रीराधा के श्रीचरण-नखच्छटा-प्रवाह में स्नान कर लेने पर भक्त एवं रसिक-हृदयों में