भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

हित चौरासी • • ३७ स्वीकार किया है क्योंकि श्रीकृष्ण शृङ्गारोपासना इन्हीं सम्बन्धों में बन भी सकती है। इनके सिवाय उसकी और कोई गति भी नहीं है। किन्तु श्रीहिताचार्य पाद का रसोपासना सिद्धान्त उक्त दोनों-स्वकीया- परकीया सिद्धान्तों से सर्वथा भिन्न है। जहाँ उक्त भावों के आचार्य गण श्रीकृष्ण को आश्रय मानते हैं वहाँ ये श्रीराधा को आश्रय मानते हैं और श्रीकृष्ण एवं सखि जनों को विषय अर्थात् रसोपासक। जैसा कि उनके वचनों में स्पष्ट है- प्रेम्णः सन् मधुरोज्वलस्य हृदयं शृङ्गार लीला कला, वैचित्री परमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता। ईशानी च शची महासुख तनुः शक्तिः स्वतंत्रा परा, श्रीवृन्दावन नाथ पट्ट महिषी राधैव सेव्या मम।। अर्थात् "जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण रूपा, शृङ्गार लीला कलाओं की विचित्र अवधि भगवान श्रीकृष्ण की भी आराधनीया और अनिर्वचनीय शासन कर्त्री हैं। जो ईश्वर रूप श्रीकृष्ण की शची तथा परम सुखमय वपु धारिणी परा और स्वतंत्रा शक्ति हैं। श्रीवृन्दावन नाथ श्रीकृष्ण की पट्टरानी श्रीराधा ही मेरी-अर्थात् सखि समुदाय की सेव्या-आराधनीया हैं।" उपरोक्त कथन में "भगवतः पूज्यैव" और "राधैव सेव्या मम" विचारणीय है। स्पष्ट है कि श्रीराधा केवल सखियों की ही नहीं वरं श्रीकृष्ण भगवान् की भी आराधनीया हैं अतः यहाँ आश्रय तत्व श्रीराधा और विषय-आराधक तत्व श्रीकृष्ण एवं सखिजन अपने आप बन जाते हैं। इन रस मूर्ति श्रीराधा की आराधना करने के ही कारण श्रीकृष्ण एवं सखिजन रसिक कहे जाते हैं। इस 'रसिक' शब्द का प्रयोग आपने अपने सम्पूर्ण ग्रन्थों में राधा के लिये कहीं भी न करके श्रीकृष्ण एवं सखिजन के ही लिये किया है; देखिये- (१) खेलत रास रसिक व्रज मण्डन। हित चौरासी प. १९ (२) जै श्री हित हरिवंश रसिक ललितादिक, लता भवन रंधनि अवलोकत, हित चौरासी प. ७२