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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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४० • • हित चौरासी मन एवं प्राण सुख से भर जाते हैं। इन सखियों की यही तो विलक्षणता है कि ये गोपियों की भाँति परस्पर में ईर्ष्या, डाह और मत्सर नहीं करती जैसा कि ब्रज के विहार में देखा जाता है। अब आचार्य्य पाद के एक पद में युगल केलि के समय सखियों की तत्सुख पूर्ण दशा का दर्शन कीजिये- सुंदर पुलिन सुभग सुख दाइक। नव नव घन अनुराग परस्पर खेलत कुँवर नागरी नाइक।। सीतल हंस सुता रस बीचिनु परसि पवन पुलिन सीकर मृदु बरषत। वर मंदार कमल चंपक कुल सौरभ सरस मिथुन मन हरषत।। सकल सुधंग विलास परावधि नाचत नवल मिले सुर गावत। मृगज मयूर मराल भ्रमर पिक अद्भुत कोटि मदन सिर नावत।। निर्मित कुसुम सैन मधु पूरित भाजन कनक निकुंज विराजत। रजनी मुख सुख राशि परस्पर सुरत समर दोऊ दल साजत।। विट कुल नृपति किसोरी कर धृत बुधि बल नीबी बंधन मोचत। नेति नेति वचनामृत बोलत प्रनय कोप प्रीतम नहिं सोचत।। जै श्री हित हरिवंश रसिक ललितादिक लता भवन रंध्रनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।। -हित चौरासी प० ७२ यह निस्वार्थता, यह तत्सुखिता, कान्ता किंवा जारिणी गोपियों में कहाँ ? क्योंकि जहाँ भोक्ता भोग्य भाव विद्यमान है वहाँ शुद्ध रति का उदय नहीं हो सकता। इसी से आचार्य्य पाद ने सखी का स्वरूप भोक्ता भोग्य से दूर रति-केवल रति ही माना है। इसी रति' को दूसरे शब्दों में सखी, सहचरि, सहेली, दासी, किङ्करी, और युगल की सन्धि सहेली, भी कहा गया है। बहुत स्पष्ट है कि बिना रति के प्रीति पूर्ण विलास-विहार की सम्पन्नता नहीं हो सकती, इसीलिये श्रीध्रुवदास जी ने कहा है- करवावत सब ख्याल इच्छा शक्ति सखी तहाँ। और सखी उभय संगम सरस पिवत नैन पुट झेलि।। व्यालीस लीला