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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

४२ • • हित चौरासी. इन सखियों का जिस सुरत केलि अवलोकन तक अधिकार है वहाँ श्रीकृष्ण के शान्त, दास्य एवं वात्सल्य भाव वाले भक्तों का प्रवेश तो होगा कहाँ से, सख्य और मधुर भाव के भक्तों का भी अधिकार नहीं है। आचार्यपाद ने बताया है- दूरे सृष्ट्यादि वार्त्ता न कलयति मनाङ् नारदादीन् स्वभक्तान्। श्रीदामाद्यैर्सुहृद्भिः न मिलति हरति स्नेह वृद्धिं स्वपित्रोः॥ और- गोविन्द प्रियवर्ग दुर्गम सखी वृन्दैरनालक्षिता,

  • श्रीराधा सुधा निधि इन सखियों की चाटुकारी वृन्दाटवी कन्दर्प श्रीलालजी भी करते हैं, क्योंकि इन्हीं सखियों की कृपा से उन्हें श्रीप्रिया के प्रसादोत्सव की प्राप्ति होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि ये सखियाँ एकान्त केलि दर्शन, विविध परिचर्या, हास-परिहास आदि प्रत्येक सेवा सख्यत्व की अधिकारिणी हैं। इनके सेवक-सेव्य भाव का प्रेमाधिक्य के कारण उच्छेद हो चुका है फिर भी वह सेवा-परायणा है प्रेमाविष्ट होने के कारण। युगल की विविध वन क्रीड़ाओं में इन सखियों का सहयोग है। वे रास-नृत्य में नृत्य करतीं, वाद्य बजातीं, भाव निदर्शन करतीं एवं समस्त आयोजन करती हैं। ये सखियाँ समस्त संगीत कलाओं में विदग्ध हैं। श्रीस्वामिनि जी विना रास कदापि सम्भव नहीं है। अतः उन्हें आगे कर ये रास क्रीड़ा में आनन्द लेती हैं। यदि मानिनि राधा रास में उपस्थित न होना चाहें तो ये लाखों युक्तियों द्वारा उन्हें प्रसन्न करके रास में लावेंगी और तब रास क्रीड़ा विस्तार होगी। इनकी युक्ति-पूर्ण मधुर वचनावली कितनी मधुर होती है, देखिये- (१) तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्धन धर लालहिं। कनक लता सी क्यों न विराजति अरुझी स्याम तमालहिं॥ गौरी गान सुतान ताल गहि रिझवत क्यों न गुपालहिं ? यह जोवन कंचन तन ग्वालिनि। सफल होत इहिं कालहिं॥