हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ • • हित चौरासी प्रातः पीतपटं कदा व्यपनयाम्यान्यांशु कस्यार्पणात् कुञ्जे विस्मृत कंचुकीमपि समानेतुं प्रधावामि वा। वध्नीयां कवरीं युनज्मि गलितां मुक्तावली मञ्जये- नेत्रे नागरि रङ्गकैश्चपि दधाम्यङ्गं व्रणं वा कदा।। -श्रीराधा सुधा निधि श्लो०७५ अर्थात् "हे नागरि ! किसी समय प्रातः काल आपने किसी का पीत पट भ्रम में बदलकर पहिन लिया होगा, तब मैं उसे बदलकर नील निचोल धारण कराऊँगी। इसी प्रकार निकुञ्ज-भवन में आप अपनी कंचुकि भूल आयी होंगी, मैं उसे दौड़कर शीघ्रता-पूर्वक ले आऊँगी। विहार में आपकी कबरी शिथिल हो गयी होगी, उसे मैं पुनः सँवार दूँगी। आपकी मुक्ता माल टूट गयी होगी, मैं उसे पिरो दूँगी और आपके नेत्रों में फिर से अञ्जन लगाकर, कस्तूरी कुङ्कुम मलय आदि से अङ्गों के क्षतों को लेपित कर दूँगी। स्वामिनि ! क्या कभी ऐसा होगा ?" इसी प्रकार केलि अवसर में मानिनी प्रिया को अनेक युक्तियों से मनाकर प्रियतम के समीप ले जाने में इन्हें परम रस का आस्वादन होता है, सखियों की नुति देखिये- छाँड़ि दै मानिनी मान मन धरिबौ। प्रनत सुंदर सुघर प्रान वल्लभ नवल वचन आधीन सौं इतौ कत करिबौ।। जपत हरि विवश तव नाम प्रति पद विमल, मनसि तव ध्यान ते निमिष नहिं टरिबौ। घटति पलु पलु सुभग सरद की जामिनी भामिनी सरस अनुराग दिसि ढरिबौ।। हौं जु कछु कहति निजु बात सुनि मानि सखि, सुमुखि बिनु काज घन विरह दुख भरिबौ। मिलत श्रीहरिवंश हित कुञ्ज किसलय सयन, करत कल केलि सुख सिंधु में तरिबौ।। -हित चौरासी पद ८३