हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ६१ 'हित ध्रुव' दुर्लभ सबनि तें, नित्य विहार स्वरूप। ललितादिक निजु सहचरी, सो सुख लहतिं अनूप॥ दुर्लभ कौ अति दुर्लभ माई। वृंदा विपिन सहज सुख दाई॥ इहि विधि विलसत प्रेमहिं सजनी। जानत नहिं कित वासर रजनी॥ प्रेम धाम वृंदा विपिन, मध्य मधुर वर जोर। सरिता रस सिंगार की, जगमगात चहुँ ओर॥ वैभव सब ऐश्वर्यता, ठाढ़ी सेवत दूरि। परसन पावत कबहुँ नहिं, श्री वृन्दावन धूरि॥ ब्रह्म जोति कौ तेज जहाँ, जोगेश्वर धरैं ध्यान। ताही कौ आवरन तहाँ, नहिं पावै कोउ आन॥ अतएव श्रीहिताचार्य्य पाद ने श्रीकृष्ण आह्लादिनी निकुञ्जेश्वरी रस प्रतिमा श्रीराधा अपनी आराध्या के लिये एक वचन समता सूचक, ऐश्वर्य भाव रहित "तूँ, तैं, तेरौ, तोसों आदि शब्दों का प्रयोग किया है क्योंकि प्रेम नगर की यही रीति है- यत्राधर्म एव धर्मः स्थापितः। अर्थात् "जहाँ अधर्म ही धर्म रूप में स्थापित है।"
- १९ - अवतरण - सर्वश्री सम्पन्न वृन्दावन नाना दिव्य तरु लता गुल्मों से अलङ्कृत हैं। शरद की शोभन ऋतु है। विमल चन्द्रिका पूर्ण रजनी है। आकाश से भूतल तक चन्द्र देव की शीतल रश्मियों का वितान तन रहा है। ऐसे सुन्दर अवसर में श्याम सुन्दर ने अपनी महामधुर वंशी बजायी और अनेकों ब्रज बालाएँ रास क्रीड़ा के लिये एकत्र हो गयी हैं। रास नृत्य में युगल किशोर सबके मध्य में शोभित है। इस झाँकी का वर्णन श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु इस प्रकार करते हैं-