भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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हितोपदेशः ❦ सुहृद्भेदः २ अथ राजपुत्रा ऊचुः—'आर्य ! मित्रलाभः श्रुतस्तावदस्माभिः । इदानीं सुहृद्भेदं श्रोतुमिच्छामः ।' विष्णुशर्मोवाच—'सुहृद्भेदं तावच्छृणुत; फिर राजपुत्र बोले-‘गुरुजी ! मित्रलाभ तो हम सुन चुके, अब सुहृद्भेद सुनना चाहते हैं ।' विष्णुशर्मा बोले–‘अब सुहृद्भेद सुनिये; यस्यायमाद्यः श्लोकः— वर्धमानो महास्नेहो मृगेन्द्रवृषयोर्वने । पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः' ॥ १ ॥ उसका पहला वाक्य यह है—‘वनमें सिंह और बैलका बड़ा स्नेह बढ़ गया था, उसे धूर्त और अति लोभी गीदड़ने छुड़वा दिया' ॥ १ ॥ राजपुत्रैरुक्तम्—'कथमेतत् ?' । विष्णुशर्मा कथयति— राजपुत्र बोले–‘यह कथा कैसे है ?' विष्णुशर्मा कहने लगे. कथा १ [ एक बनिया, बैल, सिंह और गीदड़ोंकी कहानी ] 'अस्ति दक्षिणापथे सुवर्णवती नाम नगरी । तत्र वर्धमानो नाम वणिक् निवसति । तस्य प्रचुरेऽपि वित्तेऽपरान्बन्धूनतिसमृद्धा- न्समीक्ष्य पुनरर्थवृद्धिः करणीयेति मतिर्बभूव । 'दक्षिण दिशामें सुवर्णवती नाम नगरी है; उसमें वर्धमान नाम एक बनिया रहता था । उसके पास बहुत-सा धनभी था, परन्तु अपने दूसरे भाईबन्धुओंको अधिक धनवान् देख कर उसकी यह लालसा हुई की और अधिक धन इकट्ठा करना चाहिये.