भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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९६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३५-

कारचर्चाम्" इत्यादि ॥ पश्य । पशूनामन्वेषणमेवास्मन्नियोगः । स्वनियोगचर्चा क्रियताम् । ( विमृश्य) किंत्वद्य तया चर्चया न प्रयोजनम् । यत आवयोर्भक्षितशेषाहारः प्रचुरोऽस्ति ।' दमनकः सकोपमाह—'कथमाहारार्थी भवान्केवलं राजानं सेवते ? एतदयुक्तमुक्तं त्वया । यह कह कर उसने अत्यंत रेंकनेका शब्द किया । तब वह धोबी उसके चिल्लानेसे जाग उठा और नींद टूटनेके क्रोधके मारे उठ कर लकड़ीसे गधेको मारा कि जिससे वह मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-"पराये अधिकारकी चर्चाको" इत्यादि ॥ देख-पशुओंका ढूंढना हमारा काम है ॥ अपने कामकी चर्चा करो । ( सोच कर ) परन्तु आज उस चर्चासे कुछ प्रयोजन नहीं ॥ क्योंकि अपने दोनोंके भोजनसे बचा हुआ आहार बहुत धरा है ।' दमनक क्रोधसे बोला-‘क्या तुम केवल भोजनकेही अर्थी हो कर राजाकी सेवा करते हो ? यह तुमने अयोग्य कहा । यतः,— सुहृदामुपकारकारणा- द्विषतामप्यपकारकारणात् । नृपसंश्रय इष्यते बुधै- र्जठरं को न बिभर्ति केवलम् ॥ ३५ ॥ क्योंकि-मित्रोंके उपकारके लिये, और शत्रुओंके अपकारके लिये चतुर मनुष्य राजाका आश्रय करते हैं (याने अपने मित्र या आप्तके हितके लिये और शत्रुके नाशके लियेही राजाश्रय किया जाता है ) और केवल पेट कौन नहीं भर लेता हैं ? अर्थात् सभी भरते हैं ॥ ३५ ॥ जीविते यस्य जीवन्ति विप्रा मित्राणि बान्धवाः । सफलं जीवितं तस्य आत्मार्थे को न जीवति ? ॥ ३६ ॥ जिसके जीनेसे ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं उसीका जीवन सफल है और केवल अपने (स्वार्थके) लिये कौन नहीं जीता है ? ॥ ३६ ॥ अपि च,— यस्मिञ्जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवतु । काकोऽपि किं न कुरुते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् ? ॥ ३७ ॥