भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-८६] प्रधानकी चालसे राजा और बेलकी तत्परता ११३ दमनकः संजीवकसमीपं गत्वाऽब्रवीत्—'अरे वृषभ ! एषोऽहं राज्ञा पिङ्गलकेनारण्यरक्षार्थं नियुक्तः । सेनापतिः करटकः समाज्ञापयति-‘‘सत्वरमागच्छ । न चेदस्मादरण्याद्दूरमपसर; अन्यथा ते विरुद्धं फलं भविष्यति ।” न जाने क्रुद्धः स्वामी किं विधास्यति ।' तच्छ्रुत्वा संजीवकश्चायात् । दमनक संजीवकके पास जा कर बोला—‘अरे बेल ! ये मैं वह हूं कि जिसको राजा पिंगलकने वनकी रखवालीके लिये नियुक्त किया है. सेनापति करटक तुझे आज्ञा करता है कि “शीघ्र आ; जो न आवे तो हमारे बनसे दूर चला जा । नहीं तो तेरेलिये बुरा फल होगा”, न जाने क्रोधी स्वामी क्या कर डाले’. यह सुन कर संजीवकभी साथ आया. आज्ञाभङ्गो नरेन्द्राणां ब्राह्मणानामनादरः । पृथक्शय्या च नारीणामशस्त्रविहितो वधः ॥ ८५ ॥ राजाकी आज्ञाका भंग, ब्राह्मणोंका अनादर, स्त्रियोंकी अलग शय्या रखना, इनको विना शस्त्रसे वध ( मृत्यु ) कहते हैं ॥ ८५ ॥ ततो देशव्यवहारानभिज्ञः संजीवकः सभयमुपसृत्य साष्टाङ्गपातं करटकं प्रणतवान् । फिर, देशकी रीतिको नहीं जानने वाले संजीवकने डरते डरते पास जा कर करटकको साष्टांग प्रणाम किया; तथा चोक्तम्,— मतिरेव बलाद्गरीयसी यदभावे करिणामियं दशा । इति घोषयतीव डिण्डिमः करिणो हस्तिपकाहतः क्वणन् ॥ ८६ ॥ जैसा कहा है—बलसे बुद्धि अधिक बड़ी है कि जिस बुद्धिके न होनेसे हाथियोंकी ऐसी दशा होती है, अर्थात् बली होने पर भी मतिहीन होनेसे पराधीन हो जाते हैं; यही बात मानों हाथीवान्‌से बजाया गया हाथीका नगाड़ा शब्द करके कहता है ॥ ८६ ॥ हि० ८