भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

११८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ९३- निश्चय करके वही मंत्री श्रेष्ठ है जो दमड़ी दमड़ी करके कोषको बढ़ावे, क्योंकि कोषयुक्त राजाका कोषही प्राण है, केवल जीवनही प्राण नहीं है, अत एव कोषको प्राणोंसेभी अधिक रक्खे ॥ ९२ ॥ किं चान्यैर्न कुलाचारैः सेव्यतामेति पूरुषः । धनहीनः स्वपत्न्यापि त्यज्यते किं पुनः परैः ? ॥ ९३ ॥ और धन आदिके विना अन्य अच्छे कुल और आचारसे पुरुष आदर नहीं पाता है, क्यों कि धनहीन मनुष्यको उसकी स्त्री भी छोड़ देती है फिर दूसरोंकी बातही क्या है ? ॥ ९३ ॥ एतच्च राज्ञः प्रधानं दूषणम्— और यह राजाका मुख्य दोष है— अतिव्ययोऽनपेक्षा च तथाऽर्जनमधर्मतः । मोषणं दूरसंस्थानं कोशव्यसनमुच्यते ॥ ९४ ॥ बहुत खर्च करना, धनकी इच्छा न रखना, अन्यायसे धन इकट्ठा करना, अन्यायसे किसीका धन छीन लेना, और धनको ( अपनेसे ) दूर रखना यह कोषका व्यसन याने दोष कहा गया है ॥ ९४ ॥ यतः,— क्षिप्रमायमनालोच्य व्ययमानः स्ववाञ्छया । परिक्षीयत एवासौ धनी वैश्रवणोपमः' ॥ ९५ ॥ क्योंकि धनके लाभको बिना विचारे अपनी इच्छासे शीघ्र व्यय करनेवाला कुबेरके समान धनवान् होने पर भी वह धनी अवश्य दरिद्री हो जाता है' ९५ स्तब्धकर्णो ब्रूते—'शृणु भ्रातः! चिराश्रितावेतौ दमनक- करटकौ संधिविग्रहकार्याधिकारिणौ च कदाचिदर्थाधिकारे न नियोक्तव्यौ । स्तब्धकर्ण बोला—'सुनो भाई ! ये दमनक करटक बहुत दिनोंसे अपने आश्रयमें पड़े हुये हैं और लड़ाई तथा मेल करानेके अधिकारी हैं, धनके अधिकार पर उनको कभी नहीं लगाने चाहिये । अपरं च नियोगप्रस्तावे यन्मया श्रुतं तत्कथ्यते— और दूसरे, ऐसे कामके विषयमें जो मैंने सुना है सो कहता हूं—