हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११४- क्योंकि—अति चतुर मनुष्य झूठी बातोंकोभी सच्ची कर दिखाते हैं; जैसे चित्रके कामको जानने वाले मनुष्य, एकसे स्थान पर पहाड़, घर इत्यादि खींच कर नीचा ऊंचा दिखाते हैं ॥ ११३ ॥ अपरं च,— उत्पन्नेष्वपि कार्येषु मतिर्यस्य न हीयते । स निस्तरति दुर्गाणि गोपी जारद्वयं यथा ॥ ११४ ॥ और दूसरे—जिसकी बुद्धि कार्योंके उपस्थित होने परभी नहीं घटती है वह मनुष्य संकटोंसे ऐसे बच जाता है, जैसे एक ग्वालिनने दो यारोंका निस्तारा किया ॥ ११४ ॥ करटकः पृच्छति—‘कथमेतत् ?’। दमनकः कथयति— करटक पूछने लगा—‘यह कथा कैसे है ?’ दमनक कहने लगा।— कथा ७ [ ग्वाला, व्यभिचारिणी ग्वालिन, कोतवाल और उसके पुत्रकी कहानी ७ ] अस्ति द्वारवत्यां पुर्यां कस्यचिद्गोपस्य वधूर्बन्धकी। सा ग्रामस्य दण्डनायकेन तत्पुत्रेण च समं रमते । द्वारावती नाम नगरीमें किसी ग्वालेकी बहू व्यभिचारिणी थी। वह गांवके दंडनायक और उसके पुत्रके साथ रमण किया करती थी. तथा चोक्तम्,— नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ ११५ ॥ और वैसा कहा भी है कि-अग्नि काष्ठोंसे, समुद्र नदियोंसे, मृत्यु सब प्राणि- योंसे, और स्त्री पुरुषोंसे तृप्त नहीं होती है ॥ ११५ ॥ अन्यच्च,— न दानेन न मानेन नार्जवेन न सेवया । न शस्त्रेण न शास्त्रेण सर्वथा विषमाः स्त्रियः ॥ ११६ ॥ और स्त्रियोंका (धन आदिके) दानसे, सन्मानसे, (मिष्ट भाषण आदि) सीधेपनसे, सेवासे, शस्त्रसे और शास्त्रसे “वशमें होना” सब प्रकारसे कठिन है ॥ ११६ ॥