हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१२२ ] बलसे युक्तिके श्रेष्ठत्वमें कौआ-साँपकी १३१ कथा ८ [ कौएका जोडा और काले साँपकी कहानी ८ ] कस्मिंश्चित्तरौ वायसदंपती निवसतः। तयोश्चापत्यानि तत्को- टरावस्थितेन कृष्णसर्पेण खादितानि। ततः पुनर्गर्भवती वायसी वायसमाह—'नाथ ! त्यजतामयं तरुः। अत्रावस्थितकृष्णसर्पेणा- वयोः संततिः सततं भक्ष्यते । किसी वृक्ष पर काग और कागली रहा करते थे. उनके बच्चे उसके खोड़रमें रहने वाला काला सांप खाता था। पीछे फिर गर्भवती कागली कागसे कहने लगी-'हे स्वामी ! इस पेड़को छोड़ो, इसमें रहने वाला काला साँप हमारे बच्चे सर्वदा खा जाया करता है। यतः,— दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः । ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ १२१ ॥ क्योंकि—दुष्ट स्त्री, धूर्त मित्र, उत्तर देने वाला सेवक, सर्प वाले घरमें रहना, मानो साक्षात् मृत्युही है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १२१ ॥ वायसो ब्रूते-'प्रिये ! न भेतव्यम् । वारंवारं मयैतस्य महापराधः सोढः। इदानीं पुनर्न क्षन्तव्यः' । वायस्याह—'कथमेतेन बलवता सार्धं भवान्विग्रहीतुं समर्थः?'। वायसो ब्रूते— 'अलमनया शङ्कया। काग बोला-'प्यारी ! डरना नहीं चाहिये, वार वार मैंने इसका अपराध सहा है अब फिर क्षमा नहीं करूंगा।' कागली बोली-'किस प्रकार ऐसे बलवान्के साथ तुम लड़ सकते हो?' काग बोला-'यह शंका मत करो । यतः,— बुद्धिर्यस्य बलं तस्य, निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ? । पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः' ॥ १२२ ॥ क्योंकि—जिसको बुद्धि है उसको बल है और जो निर्बुद्धि है उसको बल कहांसे आवे ? देख, मदसे उन्मत्त सिंहको शशकने मार डाला' ॥ १२२ ॥ वायसी विहस्याह—'कथमेतत् ?' । वायसः कथयति— कागली हँस कर बोली-'यह कथा कैसे है?' तब काग कहने लगा ।—