हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१३६ ] पुराने सेवकको छोड़ नयेको सत्कार अनुचित १३७ और दूसरे—अप्रिय करने वाला भी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, जैसे सुन्दर मन्दिरको जलाने वाली भी अग्निमें किसका आदर नहीं होता है?' १३३ दमनकः पुनरेवाह—'देव ! स एवातिदोषः । दमनक फिरभी कहने लगा—'हे महाराज ! वही अधिक दोष है; यतः,— यस्मिन्नेवाधिकं चक्षुरारोहयति पार्थिवः । सुतेऽमात्येऽप्युदासीने स लक्ष्म्याश्रीयते जनः ॥ १३४ ॥ क्योंकि—पुत्र, मंत्री तथा साधारण मनुष्य इनमेंसे जिसके ऊपर राजा अधिक दृष्टि करता है लक्ष्मी उसी पुरुषकी सेवा करती है ॥ १३४ ॥ शृणु देव !— महाराज ! सुनिये,— अप्रियस्यापि पथ्यस्य परिणामः सुखावहः । वक्ता श्रोता च यत्रास्ति रमन्ते तत्र संपदः ॥ १३५ ॥ अप्रियभी, हितकारी वस्तुका परिणाम अच्छा होता है, और जहां अच्छा उपदेशक और अच्छे उपदेशका सुनने वाला हो वहां सब संपत्तियां रमण करती हैं ॥ १३५ ॥ त्वया च मूलभूत्यानपास्यायमागन्तुकः पुरस्कृतः । एतच्चानु- चितं कृतम् । और आपने पुराने सेवकोंको छोड़ कर इस नये आये हुएका सत्कार किया, यहभी अनुचित किया. यतः,— मूलभूत्यान्परित्यज्य नागन्तून्प्रति मानयेत् । नातः परतरो दोषो राज्यभेदकरो यतः' ॥ १३६ ॥ क्योंकि—पुराने सेवकोंको छोड़ कर नये आये हुओंका सत्कार नहीं करना चाहिये, क्योंकि इससे बढ़ कर कोई दोष राज्यमें फूट करने वाला नहीं है.’ १३६ सिंहो ब्रूते—'महदाश्चर्यम् । मया यदभयवाचं दत्त्वानीतः संव- र्धितश्च । तत्कथं मह्यं द्रुह्यति ? ।' सिंह बोला-'बड़ा आश्चर्य है ! मैं जिसे अभय वाचा दे कर लाया और उसको बढ़ाया सो मुझसे क्यों वैर करता है ?'