भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-१४४ ] गुण-दोषको जानकरही दंड देना १३९ जैसा कहा है कि-जो विपत्तिसे बचाता है वही स्नेही है, जो निर्मल अर्थात् दोषरहित है वही कर्म है, जो (पतिकी) आज्ञामें चले वही स्त्री है, जिसका सज्जन आदर करे वही बुद्धिमान् है, जो अहंकारको उत्पन्न न करे वही संपत्ति है, जो तृष्णाके रहित है वही सुखी है, जो निष्कपट है वही मित्र है और जो इन्द्रियोंके वशमें नहीं है वही पुरुष है ॥ १४१ ॥ यदि संजीवकव्यसनार्दितो विज्ञापितोऽपि स्वामी न निवर्तते तदीदृशि भृत्ये न दोषः । और जो संजीवकके स्नेहमें फँसे हुए स्वामी जताने पर भी न मानें तो मुझसे सेवक पर दोष नहीं है ॥ तथा च,— नृपः कामासक्तो गणयति न कार्यं न च हितं यथेष्टं स्वच्छन्दः प्रविचरति मत्तो गज इव । ततो मानध्मातः स पतति यदा शोकगहने तदा भृत्ये दोषान्क्षिपति न निजं वेत्त्यविनयम्' ॥ १४२ ॥ और भी कहा है कि-भोगमें आसक्त राजा कार्यको और हितकारी वचनको नहीं गिनता है और मत वाले हाथीकी तरह अपनी इच्छानुसार जो अच्छा लगता है सो करता है; और फिर घमंडके मारे जब शोकमें अर्थात् भारी आपत्तिमें गिरता है तब सेवक पर दोष पटकता है और अपने बुरे आचरणको नहीं जानता है ॥ १४२ ॥ पिङ्गलकः ( स्वगतम् ),— 'न परस्यापराधेन परेषां दण्डमाचरेत् । आत्मनावगतं कृत्वा बध्नीयात्पूजयेच्च वा ॥ १४३ ॥ पिंगलक ( अपने मनमें सोचने लगा ) कि, 'किसीके बहकानेसे दूसरोंको दंड न देना चाहिये परन्तु अपने आप जान कर उसे मारे या सन्मान करे ॥१४३॥ तथा चोक्तम्,— गुणदोषावनिश्चित्य विधिर्न ग्रहनिग्रहे । स्वनाशाय यथा न्यस्तो दर्पात्सर्पमुखे करः’ ॥ १४४ ॥ जैसा कहा है कि-घमंडसे अपने नाशके लिये सर्पके मुखमें उंगली देनेके समान गुण और दोषको बिना निश्चय करे आदर करनेकी अथवा दंड देनेकी रीति नहीं है' ॥ १४४ ॥