हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-१३ ] महदाश्रयकी प्रशंसा १६१ शृणु,— सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः । यदि दैवात्फलं नास्ति च्छाया केन निवार्यते ? ॥ १० ॥ सुन,—फल और छायासे युक्त बड़े वृक्षकी सेवा करनी चाहिये । जो भाग्यसे फल ( प्राप्य ) नहीं है तो छायाको कौन भला दूर कर सकता है ? ॥ १० ॥ अन्यच्च,— हीनसेवा न कर्तव्या कर्तव्यो महदाश्रयः । पयोऽपि शौण्डिकीहस्ते वारुणीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ और दूसरे—नीचकी सेवा नहीं करनी चाहिये, बडे पुरुषोंका आश्रय करना चाहिये, जैसे कलारिनके हाथमें दूधकोभी लोग वारुणी ( शराब ) समझते हैं ११ अन्यच्च,— महानप्यल्पतां याति निर्गुणे गुणविस्तरः । आधाराधेयभावेन गजेन्द्र इव दर्पणे ॥ १२ ॥ और गुणहीनमें बड़ा गुणका कहना भी लघुताको प्राप्त होता है, जैसे आधार और आधेयभावसे दर्पणमें हाथीका प्रतिबिंब छोटा दीखता है ॥ १२ ॥ विशेषतश्च,— व्यपदेशेऽपि सिद्धिः स्यादतिशक्ते नराधिपे । शशिनो व्यपदेशेन शशकाः सुखमासते' ॥ १३ ॥ और विशेष करके राजाके सबल होने पर उसके छल(बहाने)सेभी कार्य सिद्ध हो जाता है । जैसे चन्द्रमाके छल(बहाने)से खरगोश सुखसे रहने लगे' ॥ १३ ॥ मयोक्तम्—'कथमेतत् ?' । पक्षिणः कथयन्ति— मैंने कहा-'यह कथा कैसी है ?' पक्षी कहने लगे ।— कथा ४ [ हाथियोंका झुंड और बूढे शशककी कहानी ४ ] 'कदाचिदपि वर्षासु वृष्टेरभावात्तृषार्तो गजयूथो यूथपति- माह—'नाथ ! कोऽभ्युपायोऽस्माकं जीवनाय ? नास्ति क्षुद्रजन्तूनां १ जिसमें वस्तु रक्खी जाय. २ वस्तु. हि० ११