हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-३०] छिपा हुआ पतिको जान कर यारसे भाषण १७१ त्वं जारः पापमतिः । मनोलौल्यात्पुष्पताम्बूलसदृशः कदाचि- त्सेव्यसे कदाचिन्न सेव्यसे च । स च स्वामी मां विक्रेतुं देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्योऽपि दातुमीश्वरः । किं बहुना, तस्मिञ्जीवति जीवामि, तन्मरणे चानुमरणं करिष्यामीति प्रतिज्ञा वर्तते । तू तो पापबुद्धी है । चित्तकी चंचलतासे पुष्प-तांबूलके समान है, कभी सेवा किया जाता है और कभी नहीं किया जाता है । और वह स्वामी मुझे बेचनेके लिये और देवता और ब्राह्मणोंको देनेके लियेभी समर्थ है । अधिक क्या कहूँ ? उसके जीते मैं जीती हूँ, उसके मरने पर सती हो जाऊँगी यह मेरी प्रतिज्ञा है । यतः,— तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च यानि लोमानि मानवे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्तारं याऽनुगच्छति ॥ २८ ॥ क्योंकि-जो स्त्री पतिकी आज्ञामें चलती है वह, मनुष्य ( शरीर ) के ऊपर जो तीन करोड़ पचास लाख लोम ( रोंगटे ) हैं उतने वर्ष तक स्वर्गमें वसती है ॥ अन्यच्च,— व्यालग्राही यथा व्यालं बलादुद्धरते बिलात् । तद्वद्भर्तारमादाय स्वर्गलोके महीयते ॥ २९ ॥ और दूसरे-जैसे मदारी ( मन्त्रके प्रभावसे ) साँपको बिलसे बलसे खींचता है वैसेही स्त्री ( पतिव्रतके प्रभावसे ) पतिको स्वर्गलोकमें ले जा कर सुख भोगती है ॥ अपरं च,— चितौ परिष्वज्य विचेतनं पतिं प्रिया हि या मुञ्चति देहमात्मनः । कृत्वापि पापं शतसंख्यमप्यसौ पतिं गृहीत्वा सुरलोकमाप्नुयात्' ॥ ३० ॥ और-जो स्त्री चितामें अपने मरे हुए भर्ताको गोदमें ले कर अपने शरीरको छोड़ती ( सती हो जाती ) है वह सौ पाप करकेभी पतिको ले कर स्वर्गलोकको जाती है' ॥ ३० ॥