हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 204, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ हितोपदेशः [ विग्रहः ६४- ततो राजा काकश्च स्वां प्रकृतिमापन्नौ । शुकोऽप्युत्थाय चलितः । पश्चाच्चक्रवाकेणानीय प्रबोध्य कनकालंकारादिकं दत्त्वा संप्रेषितो ययौ । शुकोऽपि विन्ध्याचलराजानं प्रणतवान् । राजोवाच—'शुक ! का वार्ता ? कीदृशोऽसौ देशः ?'। शुको ब्रूते— 'देव ! संक्षेपादियं वार्ता । संप्रति युद्धोद्योगः क्रियताम् । देश- श्वासौ कर्पूरद्वीपः स्वर्गैकदेशो राजा च द्वितीयः स्वर्गपतिः कथं वर्णयितुं शक्यते ?'। ततः सर्वाञ्छिष्टानाहूय राजा मन्त्रयितुमप- विष्टः । आह च—'संप्रति कर्तव्यविग्रहे यथा कर्तव्यमुपदेशं ब्रूत । विग्रहः पुनरवश्यं कर्तव्यः । फिर राजा और काग अपने आपेमें आये । तोताभी उठ कर चला । तो चकवेने बुला कर और समझा कर और सुवर्णके आभूषण आदि दे कर बिदा किया और वह गया । फिर तोतेने विंध्याचलके राजाको दंडवत किया । राजा बोला-'हे तोते ! क्या समाचार है ? वह कैसा देश है ?' तोतेने कहा-'महाराज ! संक्षेपसे यह बात है, अब लड़ाईका ठाठ करिये । यह कर्पूरद्वीप देश एक स्वर्गका टुकड़ा है और राजा दूसरा इन्द्र है । कैसे वर्णन किया जा सकता है ?' फिर सब शिष्टोंको बुला कर एकान्तमें विचारकरनेके लिये बैठ गया और बोला-'अब जो लड़ाई करनी है उसमें जो कुछ करना है सो कहो । फिर लड़ाई तो अवश्य करनीही है । तथा चोक्तम्— असंतुष्टा द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभुजः । सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलस्त्रियः' ॥ ६४ ॥ जैसा कहा है—असंतोषी ब्राह्मण, संतोषी राजा, लज्जावती वेश्या और निर्लज्जा कुलकी स्त्री ये चारों नष्ट होते हैं, अत एव निन्दा करनेके योग्य हैं' ॥ दूरदर्शी नाम गृध्रो ब्रूते—'देव ! व्यसनितया विग्रहो न विधिः । दूरदर्शी नाम गिद्ध बोला-'महाराज ! विना अवसरके संग्राम करनेकी रीति नहीं है ।