हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ हितोपदेशः [ विग्रहः ६८- तथा चोक्तम्,— किं मन्त्रेणाननुष्ठानाच्छास्त्रवित्पृथिवीपतेः । न ह्यौषधपरिज्ञानाद्व्याधेः शान्तिः क्वचिद्भवेत् ॥ ६८ ॥ जैसा कहा है—बिना किये, शास्त्रके जानने वाला राजाके परामर्शसे क्या फल होता है ? जैसे औषधमात्रके जान लेनेसे कभी रोगकी शांति नहीं होती है ॥ ६८ ॥ राजादेशश्चानतिक्रमणीयः । यथाश्रुतं तन्निवेदयामि । और राजाकी आज्ञा भंग नहीं करनी चाहिये । जैसा सुना है सो निवेदन करता हूँ । शृणु,— नद्यद्रिवनदुर्गेषु यत्र यत्र भयं नृप ! । तत्र तत्र च सेनानीर्यायाद्व्यूहीकृतैर्बलैः ॥ ६९ ॥ सुनिये—हे राजा ! नदी, पहाड़, वन तथा कठिन स्थानोंमें जहाँ जहाँ भय होय जहाँ वहाँ सेनापति व्यूह बाँध कर ( परेड बना कर ) सेनाके साथ जाय ॥ ६९॥ बलाध्यक्षः पुरो यायात्प्रवीरपुरुषान्वितः । मध्ये कलत्रं स्वामी च कोशः फल्गु च यद्द्बलम् ॥ ७० ॥ सेनापति बड़े बड़े योद्धाओंके साथ अगाड़ी चले, और बीचमें स्त्रियाँ, स्वामी, कोश (खजाना) और निर्बल सेना जाय ॥ ७० ॥ पार्श्वयोरुभयोरश्वा अश्वानां पार्श्वतो रथाः । रथानां पार्श्वयोर्नागा नागानां च पदातयः ॥ ७१ ॥ दोनों ओर आसपास घोड़े, घोड़ोंके पार्श्वमें रथ, रथोंके आसपास हाथी और हाथियोंके आसपास पैदल ॥ ७१ ॥ पश्चात्सेनापतिर्यायात्खिन्नानाश्वासयञ्छनैः । मन्त्रिभिः सुभटैर्युक्तः प्रतिगृह्य बलं नृपः ॥ ७२ ॥ सेनापति पीछे वाले साहसहीन पुरुषोंको धीरे धीरे हिम्मत बँधाता हुआ जाय और राजा मंत्रियोंके तथा बड़े शूरवीरोंके साथ सेना ले कर जाय ॥ ७२ ॥ समेयाद्विषमं नागैर्जलाढ्यं समहीधरम् । सममश्वैर्जलं नौभिः सर्वत्रैव पदातिभिः ॥ ७३ ॥