हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-९९ ] वीरवरको नौकरीमें रखना, रातमें शब्द सुनना १९३ मन्त्रिवचनादाहूय वीरवराय ताम्बूलं दत्त्वा पञ्चशतानि सुवर्णानि दत्तानि । तद्विनियोगश्च राज्ञा सुनिभृतं निरूपितः । तदर्धं वीर- वरेण देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दत्तम् । स्थितस्यार्धं दुःखितेभ्यः, तद- वशिष्टं भोज्यव्ययविलासव्ययेन । एतत्सर्वं नित्यकृत्यं कृत्वा राज- द्वारमहर्निशं खड्गपाणिः सेवते । यदा च राजा स्वयं समादिशति तदा स्वगृहमपि याति । 'पहले मैं शूद्रक नाम राजाके क्रीड़ा-सरोवरमें कर्पूरकेलि नामक राजहंसकी पुत्री कर्पूरमंजरीके साथ अनुरक्त (प्रेमवश) हो गया था । वहाँ वीरवर नाम महा- राजकुमार किसी देशसे आया और राजाकी ड्योढ़ी पर आ कर द्वारपालसे बोला- 'मैं राजपुत्र हूं, नोकरी चाहता हूँ । राजाका दर्शन कराओ ।' फिर इसने उसे राजाका दर्शन कराया और वह बोला-'महाराज ! जो मुझ सेवकका प्रयोजन हो तो मुझे नौकर रखिये ।' शूद्रक बोला-"तुम कितनी तनखाह चाहते हो ?" वीरवर बोला-'नित्य पाँच सौ मोहरें दीजिये ।' राजा बोला-'तेरे पास क्या क्या सामग्री है ?' वीरवर बोला-'दो बाँहें और तीसरा खड्ग ।' राजा बोला-'यह बात नहीं हो सकती है । यह सुन कर वीरवर चल दिया । फिर मंत्रियोंने कहा- 'हे महाराज ! चार दिनका वेतन दे कर इसका स्वरूप जान लीजिये कि यह क्या उपकारी है, जो इतना धन लेता है या उपयोगी नहीं है ।' फिर मंत्रीके वचनसे बुलवाया और वीरवरको बीड़ा दे कर पाँच सौ मोहरें दे दीं । और उसका काम भी राजाने छुप कर देखा । वीरवरने उस धनका आधा देवताओंको और ब्राह्मणोंको अर्पण कर दिया । बचे हुएका आधा दुखियोंको; उससे बचा हुआ भोजनके तथा विलासादिमें खर्च किया । यह सब नित्य काम करके वह राजाके द्वार पर रातदिन हाथमें खड्ग ले कर सेवा करता था और जब राजा आप आज्ञा देता तब अपने घर जाता था । अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यां रात्रौ राजा सकरुणं क्रन्दनध्वनिं शुश्राव । शूद्रक उवाच—'कः कोऽत्र द्वारि ?' । तेनोक्तम्— 'देव ! अहं वीरवरः ।' राजोवाच—'क्रन्दनानुसरणं क्रियताम् ।' वीरवरो 'यथाज्ञापयति देवः' इत्युक्त्वा चलितः । राज्ञा च चिन्तितम्—'नैतदुचितम् । अयमेकाकी राजपुत्रो मया सूचिभेद्ये तमसि प्रेरितः । तदनु गत्वा किमेतदिति निरूपयामि।' हि० १३