भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

ऽहमेवंभूतः स्वामिराज्यरक्षार्थं यन्ममोपयोगः श्लाघ्यः । तत्को- ऽधुना विलम्बस्य हेतुः ? एवंविधे कर्मणि देहस्य विनियोगः श्लाघ्यः । फिर वीरवरने अपने घर जा कर सोती हुई अपनी स्त्रीको और बेटेको जगाया । वे दोनों नींदको छोड़, उठ कर खड़े हो गये । वीरवरने वह सब लक्ष्मीका वचन उनको सुनाया । उसे सुन कर शक्तिधर आनन्दसे बोला-‘मैं धन्य हूँ जो ऐसे, स्वामीके राज्यकी रक्षाके लिये मेरा उपयोग प्रशंसनीय है । इसलिये अब विलम्बका क्या कारण है ? ऐसे काममें देहका त्याग प्रशंसनीय है । यतः,— धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् । सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति’ ॥ १०० ॥ क्योंकि—पण्डितको परोपकारके लिये धन और प्राण छोड़ देने चाहिये, विनाश तो निश्चय होगाही, इसलिये अच्छे कार्यके लिए प्राणोंका त्याग श्रेष्ठ है’ ॥ १०० ॥ शक्तिधरमातोवाच—‘यद्येतन्न कर्तव्यं तत्केनान्येन कर्मणा मुख्यस्य महावर्तनस्य निष्क्रयो भविष्यति ?’ इत्यालोच्य सर्वे सर्वमङ्गलायाः स्थानं गताः। तत्र सर्वमङ्गलां संपूज्य वीरवरो ब्रूते—‘देवि ! प्रसीद । विजयतां विजयतां शूद्रको महाराजः, गृह्य- तामुंपहारः ।’ इत्युक्त्वा पुत्रस्य शिरश्छिच्छेद । ततो वीरवरश्चि- न्तयामास—‘गृहीतराजवर्तनस्य निस्तारः कृतः। अधुना निष्पुत्र- स्य जीवनेनालम् ।’ इत्यालोच्यात्मनः शिरच्छेदः कृतः । ततः स्त्रियापि स्वामिपुत्रशोकार्तया तदनुष्ठितम् । शक्तिधरकी माता बोली-‘जो यह नहीं करोगे तो और किस कामसे इस बड़े वेतनके ऋणसे उनंतर होगे ? ।’ यह विचार कर सब सर्वमंगला देवीके स्थान पर गये । वहाँ सर्वमंगला देवीको पूज कर वीरवरने कहा-‘हे देवी ! प्रसन्न हो; शूद्रक महाराजकी जय हो जय हो ! यह भेंट लो ।’ यह कह कर पुत्रका शिर काट डाला । फिर वीरवर सोचने लगा कि-‘लिये हुए राजाके ऋणको तो चुका दिया। अब बिना पुत्रके जीवित किस कामका ? ।’ यह विचार कर उसने अपना शिर