भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

-१०३ ] सर्वस्वदानी वीरवरको कर्नाटकराज्यका अर्पण १९७ अंतर्धान हो गई। पीछे वीरवर अपने स्त्रीपुत्रसमेत घरको गया । राजा भी उनसे छुप कर शीघ्र रनवासमें चला गया । अथ प्रभाते वीरवरो द्वारस्थः पुनर्भूपालेन पृष्टः सन्नाह—‘देव ! सा रुदती मामवलोक्यादृश्याभवत् । न काप्यन्या वार्ता विद्यते ।' तद्वचनमाकर्ण्य राजाऽचिन्तयत्—‘कथमयं श्लाघ्यो महासत्त्वः ? इसके अनन्तर प्रातःकाल राजाने ड्योढ़ी पर बैठे हुए वीरवरसे फिर पूछा और वह बोला—'हे महाराज ! वह रोती हुई स्त्री मुझे देख कर अन्तर्धान हो गई, और कुछ दूसरी बात नहीं थी।' उसका वचन सुन कर राजा सोचने लगा— 'इस महात्माको किस प्रकार बड़ाई करूँ ? यतः,— प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्याद्विकत्थनः । दाता नापात्रवर्षी च प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ॥ १०२ ॥ क्योंकि—उदार पुरुषको मीठा बोलना चाहिये, शूरको अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, दाताको कुपात्रमें दान न करना चाहिये, और उचित कहने वालेको दयारहित नहीं होना चाहिये ॥ १०२ ॥ एतन्महापुरुषलक्षणमेतस्मिन्सर्वमस्ति ।' ततः स..राजा प्रातः शिष्टसभां कृत्वा सर्ववृत्तान्तं प्रस्तुत्य प्रसादात्तस्मै कर्नाटकराज्यं ददौ। तत्किमागन्तुको जातिमात्राद्दुष्टः ? तत्राप्युत्तमाधममध्यमाः सन्ति ।' यह महापुरुषका लक्षण इसमें सब है । पीछे उस राजाने प्रातःकाल शिष्ट लोगोंकी सभा करके और सब वृत्तान्तकी प्रशंसा करके प्रसन्नतासे उसे कर्नाटकका राज्य दे दिया । इसलिये (मैं जानना चाहता हूं) क्या विदेशी केवल जाति मात्रसेही दुष्ट होता है ? उनमें भी उत्तम, निकृष्ट और मध्यम होते हैं । चक्रवाको ब्रूते— ‘योऽकार्यं कार्यवच्छास्ति स किंमन्त्री नृपेच्छया । वरं स्वामिमनोदुःखं तन्नाशो न त्वकार्यतः ॥ १०३ ॥ चकवा बोला—'जो राजाकी इच्छा(के अनुरोध)से, अयोग्य कार्यको योग्य कार्यके समान उपदेश करता है वह नीच मंत्री है। क्योंकि स्वामीके मनको