भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

-१३ ] अनधीत पुत्रोंके लिये राजाकी चिंता ३ स्वामिगुणोपेतः सुदर्शनो नाम नरपतिरासीत् । स भूपतिरेकदा केनापि पठ्यमानं श्लोकद्वयं शुश्राव— गंगाजीके किनारेपर पटना नामका एक नगर है, वहाँ राजाके संपूर्ण गुणोंसे शोभायमान, सुदर्शन नामका एक राजा रहता था. एक समय उस राजाने किसीको पढ़ते हुए, ये दो श्लोक सुने— “अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् । सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥ १० ॥ “अनेक सन्देहोंको दूर करनेवाला और छिपे हुए अर्थको दिखाने वाला शास्त्र, सबका नेत्र है, ज्ञानरूपी जिसके पास वह शास्त्र नेत्र नहीं है वह अन्धा है ॥१०॥ यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकता । एकैकमप्यनर्थाय, किमु यत्र चतुष्टयम् ?” ॥ ११ ॥ यौवन, धन, प्रभुता और अविचारता, इनमेंसे एक एक भी हो तो अन- र्थके करने वाली है और जिसमें ये चारों होय वहांका क्या ठीक है ?” ॥११॥ इत्याकर्ण्यात्मनः पुत्राणामनधिगतशास्त्राणां नित्यमुन्मार्ग- गामिनां शास्त्राननुष्ठानेनोद्विग्नमनाः स राजा चिन्तयामास— इन दोनो श्लोकोंको सुनकर, वह राजा, शास्त्रको न पढ़नेवाले, तथा प्रतिदिन कुमार्गमें चलने वाले, अपने लड़कोंके, शास्त्र न पढनेसे मन व्याकुल होकर सोचने लगा— ‘कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न धार्मिकः । काणेन चक्षुषा किं वा, चक्षुःपीडैव केवलम् ॥ १२ ॥ जो न पण्डित है और न धर्मशील है, ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ किस कामका ? जैसे काणी आंखसे क्या सरता है ? केवल आँखकोही पीड़ा है ॥ १२ ॥ अजात-मृत-मूर्खाणां वरमाद्यौ न चान्तिमः । सकृद्दुःखकरावाद्यावन्तिमस्तु पदे पदे ॥ १३ ॥ उत्पन्न नहिं हुआ, तथा होकर मर गया और मूर्ख, इन तीनोंमेंसे पहले २ दो अच्छे हैं और अन्तिम(मूर्ख) अच्छा नहीं, क्योंकि पहले दोनों एकही १ शूरता, वीरता, दया और शील आदि. २ उत्पन्न नहीं हुआ और होकर मर गया.