हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 231, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१४४ ] सारसकी स्वामिभक्तिमें परायणता २११ परंतु,-मैं जानता हूँ कि नेक, सच्चा, चतुर और स्वामीको चाहने वाला सेवक तो मिलना भी कठिन है ॥ १४० ॥ सारसो ब्रूते—'शृणु देव ! सारसने कहा-'महाराज ! सुनिये,— यदि समरमपास्य नास्ति मृत्यो- र्भयमिति युक्तमितोऽन्यतः प्रयातुम् । अथ मरणमवश्यमेव जन्तोः, किमिति मुधा मलिनं यशः क्रियेत ? ॥ १४१ ॥ जो युद्धको छोड़ कर जानेमें मृत्युका भय न हो तो यहाँसे अन्य कोई स्थानमें चले जाना ठीक है; पर प्राणीका मरण अवश्य ही है इसलिये जा कर क्यों वृथा अपना यश मलिन करना चाहिये ? ॥ १४१ ॥ अन्यच्च,— भवेऽस्मिन्पवनोद्भ्रान्तवीचिविभ्रमभङ्गुरे । जायते पुण्ययोगेन परार्थे जीवितव्ययः ॥ १४२ ॥ और दूसरे-वायुसे उठी हुई ल्हरियोंके खेलके समान क्षणभंगुर इस असार संसारमें पराये उपकारके लिये प्राणोंका त्याग बड़े पुण्यसे होता है ॥ १४२ ॥ स्वाम्यमात्यश्च राष्ट्रं च दुर्गं कोशो बलं सुहृत् । राज्याङ्गानि प्रकृतयः पौराणां श्रेणयोऽपि च ॥ १४३ ॥ और स्वामी, मंत्री, राज्य, गढ़, कोश, सेना, मित्र और पुरवासियोंके समूह ये राज्यके अंग हैं ॥ १४३ ॥ देव ! त्वं च स्वामी सर्वथा रक्षणीयः । और हे महाराज ! आप स्वामी हैं, आपकी सर्वथा रक्षा करनी चाहिये; यतः,— प्रकृतिः स्वामिनं त्यक्त्वा समृद्धापि न जीवति । अपि धन्वन्तरिर्वैद्यः किं करोति गतायुषि ? ॥ १४४ ॥ क्योंकि—स्वामीको त्याग कर प्रजा, सब ऐश्वर्यसे युक्त भी नहीं जी सकती है, जैसे आयु का अंत होने पर धन्वन्तरि वैद्य भी क्या कर सकता है? ॥ १४४ ॥