भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 234

हितोपदेशः संधिः ४ पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! विग्रहः श्रुतो- ऽस्माभिः, संधिरधुनाऽभिधीयताम् ।’ फिर कथाके आरम्भमें राजपुत्रोंने कहा-‘हे गुरुजी ! हम विग्रह सुन चुके; अब सन्धि सुनाइये ।’ विष्णुशर्मणोक्तम्—‘श्रूयताम्; संधिमपि कथयामि यस्या- यमाद्यः श्लोकः— वृत्ते महति संग्रामे राज्ञोर्निहतसेनयोः । स्थेयाभ्यां गृध्रचक्राभ्यां वाचा संधिः कृतः क्षणात्’ ॥ १ ॥ विष्णुशर्माने कहा-‘सुनिये, संधि भी कहता हूँ कि जिसके आदिका यह वाक्य है—दोनों राजाओंकी सेनाके मरने पर और घनघोर युद्ध होने पर गिद्ध और चकवेने पंच बन कर शीघ्र मेल करा दिया’ ॥ १ ॥ राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’ । विष्णुशर्मा कथयति— राजपुत्र बोले-‘यह कथा कैसी है ?’ विष्णुशर्मा कहने लगे ।— कथा १ [ हंस और मोरके मेलके लिए कहानी १ ] ततस्तेन राजहंसेनोक्तम्—‘केनास्मद्दुर्गे निक्षिप्तोऽग्निः ? किं पार- क्येण किं वाऽस्मद्दुर्गवासिना केनापि विपक्षप्रयुक्तेन ?’ । चक्रो ब्रूते—‘देव ! भवतो निष्कारणबन्धुरसौ मेघवर्णः सपरिवारो न दृश्यते। तन्मन्ये तस्यैव विचेष्टितमिदम् ।’ राजा क्षणं विचि- न्त्याह—‘अस्ति तावदेव मम दुर्दैवमेतत् । फिर उस राजहंसने कहा-‘हमारे किलेमें किसने आग लगाई है ? शत्रुने अथवा शत्रुसे सिखाये हुए किसी हमारे गढ़के रहनेवालेने ?’ चकवा बोला— महाराज ! आपका अकृत्रिम बन्धु वह मेघवर्ण अपने परिवारसहित नहीं दीखता