भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 238

२१८ हितोपदेशः [ संधिः ७- 'स्वामी ! इस सेवकको बड़ा सुख है, क्योंकि यह चोरी करके कपूर खाया करता है, यह मैंने इसका मुख सूँघ कर जान लिया।' जैसा कहा है-'स्त्रियोंका भोजन दूनो होता है' इत्यादि।' यह सुन कर सेवकने क्रोध कर कहा-'हे स्वामी ! जिस स्वामीकी ऐसी स्त्री है वहाँ सेवक कैसे टिक सकता है कि जहाँ क्षणक्षणमें घरवाली सेवकका मुख सूँघती है?' फिर वह उठ कर जाने लगा, तब बनियेने बड़ी कोशिशसे समझा कर रख उसे लिया । इसलिये मैं कहता हूँ-"आपत्तिके उत्पन्न होने पर" आदि ।' ततो यद्भविष्येणोक्तम्,— 'यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ?' ॥ ७ ॥ फिर यद्भाविष्यने कहा-'जो होनहार नहीं है वह कभी नहीं होगा, और जो होनहार है उससे उलटा कभी न होगा अर्थात् होनहार अवश्य होगा यह चिंतारूपी विषका नाश करने वाली औषध क्यों नहीं पीते हो ?' ॥ ७ ॥ ततः प्रातर्जालेन बद्धः प्रत्युत्पन्नमतिर्मृतवदात्मानं संदर्श्य स्थितः । ततो जालादपसारितो यथाशक्त्युत्प्लुत्य गभीरं नीरं प्रविष्टः । यद्भाविष्यश्च धीवरैः प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि-"अनागतविधाता" इत्यादि ॥ तद्यथाहमन्यह्रदं प्राप्नोमि तथा क्रियताम् ।' हंसावाहतुः—'जलाशयान्तरे प्राप्ते तव कुशलम्, स्थले गच्छतस्ते को विधिः ?' कूर्म आह—'यथाऽहं भवद्भ्यां सहाकाशवर्त्मना यामि तथा विधीयताम् ।' हंसौ ब्रूतः—'कथमुपायः संभवति ?' । कच्छपो वदति—'युवाभ्यां चञ्चुधृतं काष्ठखण्डमेकं मया मुखेनावलम्ब्य गन्तव्यम् । युवयोः पक्षबलेन मयाऽपि सुखेन गन्तव्यम् ।' फिर प्रातःकाल जालसे बँध कर प्रत्युत्पन्नमति अपनेको मरेके समान दिखला कर बैठा रहा । फिर जालसे बाहर निकाला हुआ अपनी शक्तिके अनुसार उछल कर गहरे पानीमें घुस गया और यद्भविष्यको धीवरोंने पकड़ लिया और मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ, “अनागतविधाता” इत्यादि—॥ सो जिस प्रकार मैं दूसरे सरोवरको पहुँच जाऊँ वैसे करो।' दोनों हंस बोले-'दूसरे सरोवरके १ सुहृद्भेदका ११९ वाँ श्लोक देखो ।

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 238, कुल 302 में से · BharatKosha