भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

क्योंकि—सज्जनोंकी भी बुद्धि दुष्टोंके वचनोंसे सचमुच चलायमान हो जाती है—जैसे दुष्टोंकी बातोंसे विश्वासमें आ कर यह ब्राह्मण चित्रकर्णनामक ऊँटके समान मरता है' ॥ ५३ ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । स कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' वह कहने लगा ।— कथा ११ [ मदोत्कट नामक सिंह और सेवकोंकी कहानी ११ ] ‘अस्ति कस्मिंश्चिद्वनोद्देशे मदोत्कटो नाम सिंहः । तस्य सेव- कास्त्रयः काको व्याघ्रो जम्बुकश्च । अथ तैर्भ्रमद्भिः कश्चिदुष्ट्रो दृष्टः पृष्टश्च—'कुतो भवानागतः सार्थाद्भ्रष्टः ?' । स चात्मवृत्तान्त- मकथयत् । ततस्तैर्नीत्वा सिंहेऽसौ समर्पितः । तेनाभयवाचं दत्त्वा चित्रकर्ण इति नाम कृत्वा स्थापितः । अथ कदाचित्सिंहस्य शरीर- वैकल्याद्भूरिवृष्टिकारणाच्चाहारमलभमानास्ते व्यग्रा बभूवुः । तत- स्तैरालोचितम्—'चित्रकर्णमेव यथा स्वामी व्यापादयति तथाऽनु- ष्ठीयताम् । किमनेन कण्टकभुजा ?' व्याघ्र उवाच—'स्वामिनाऽभ- यवाचं दत्त्वाऽनुगृहीतस्तत्कथमेवं संभवति ?' । काको ब्रूते—'इह समये परिक्षीणः स्वामी पापमपि करिष्यति । ‘किसी वनमें मदोत्कट नाम सिंह रहता था । उसके काग, बाघ और सियार तीन सेवक थे । पीछे उन्होंने घूमते घूमते किसी ऊँटको देखा और पूछा—'तुम साथियोंसे बिछड कर कहाँसे आये हो ?' फिर उसने अपना वृत्तान्त कह सुनाया । तब उन्होंने उसे ले जा कर सिंहको सौंप दिया । उसने अभय-वचन दे कर उसका चित्रवर्ण नाम रख कर रख लिया । बाद एक दिन वे सिंहके शरीरमें खेद तथा वर्षाके कारण भोजनको न पा कर दुखी होने लगे । फिर उन्होंने विचारा जिसमें चित्रकर्णको ही स्वामी मारे सो उपाय करो । इस काँटे चरने वालेसे क्या है ?' बाघ बोला—'स्वामीने उसे अभय-वचन दे कर रक्खा है इसलिये ऐसा कैसे हो सकता है ?' काग बोला—'इस समय भूखसे घबराया हुआ स्वामी (सिंह) पाप भी करेगा ।

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 258, कुल 302 में से · BharatKosha