भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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२४० हितोपदेशः [ संधिः ५६- तथा च,- न भूप्रदानं न सुवर्णदानं न गोप्रदानं न तथाऽन्नदानम्। यथा वदन्तीह महाप्रदानं सर्वेषु दानेष्वभयप्रदानम् ॥ ५६ ॥ जैसा कहा है-इस संसारमें जैसा सब दानोंमें श्रेष्ठ दान अभयदान कहा है, वैसा न तो भूमिदान, न सुवर्णदान, न गोदान और न अन्नदान कहा है ॥५६॥ अन्यच्च,- सर्वकामसमृद्धस्य अश्वमेधस्य यत्फलम् । तत्फलं लभते सम्यग्रक्षिते शरणागते' ॥ ५७ ॥ और दूसरे सब-मनोरथोंको देने वाले अश्वमेध यज्ञका जो फल है वही फल शरणागतकी अच्छी तरह रक्षा करनेसे मिलता है' ॥ ५७ ॥ काको ब्रूते-'नासौ स्वामिना व्यापादयितव्यः। किंत्वस्माभिरेव तथा कर्तव्यं यथाऽसौ स्वदेहदानमङ्गीकरोति ।' सिंहस्तच्छ्रुत्वा तूष्णीं स्थितः । ततोऽसौ लब्धावकाशः कूटं कृत्वा सर्वानादाय सिंहान्तिकं गतः । अथ काकेनोक्तम्-'देव ! यत्नादप्याहारो न प्राप्तः । अनेकोपवासखिन्नः स्वामी । तदिदानीं मदीयमांसमुप- भुज्यताम् । काग बोला-'स्वामीको इसे नहीं मारना चाहिये, परन्तु हमही ऐसा करेंगे कि जिसमें वह अपनी देहका दान देना अंगीकार कर लें । यह सुन कर सिंह चुप हो गया । फिर यह मौका पा कर छल करके सबको साथ ले सिंहके पास गया; फिर कागने कहा-'महाराज ! बड़े यत्नसे भी भोजन नहीं मिला, कई दिनोंसे नहीं खानेके कारण स्वामी दुखी हो रहे हैं, इससे अब मेरे मांसको भोजन करें, यतः,- स्वामिमूला भवन्त्येव सर्वाः प्रकृतयः खलु । समूलेष्वपि वृक्षेषु प्रयत्नः सफलो नृणाम्' ॥ ५८ ॥ क्योंकि-स्वामी ही सब प्रजाका सचमुच मूल कारण है, और मनुष्योंका मूल अर्थात् जड़युक्त वृक्षोंके होनेसे उपाय सफल होता है अर्थात् फल मिलता है; अर्थात् जीवें तो ही हमारा जीवन सफल है' ॥ ५८ ॥