भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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-७७] संबंध और संबंधियोंकी समस्या २४५ नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते येन केनचित् । अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ७२ ॥ किसी प्राणीको अपने शरीरका भी ऐसा बहुत काल तक साथ नहीं मिलता है, फिर दूसरों ( पुत्रादिकों ) से क्या आशा है ? ॥ ७२ ॥ अपि च,— संयोगो हि वियोगस्य संसूचयति संभवम् । अनतिक्रमणीयस्य जन्ममृत्योरिवागमम् ॥ ७३ ॥ और भी—जैसे जन्म अवश्य होने वाली मृत्युके आगमनको सूचना करता है वैसे ही संयोग अवश्य होने वाले वियोगको सूचना करता है ॥ ७३ ॥ आपातरमणीयानां संयोगानां प्रियैः सह । अपथ्यानामिवान्नानां परिणामोऽतिदारुणः ॥ ७४ ॥ और अपथ्य अर्थात् हित नहीं करने वाली भक्ष्य वस्तुओंके समान क्षण- भर सुन्दर लगने वाले स्त्री-पुत्रादि प्रिय-जनोंके साथ मिलनेका अन्त बड़ा कष्टदायक होता है ॥ ७४ ॥ अपरं च,— व्रजन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितां यथा । आयुरादाय मर्त्यानां तथा रात्र्यहनी सदा ॥ ७५ ॥ और भी, जैसे नदीके जलप्रवाह जाते हैं और फिर नहीं लौटते हैं, वैसे ही रात और दिन प्राणियोंकी आयुको ले कर प्रतिक्षणको चले जाते हैं और लौटते नहीं हैं ॥ ७५ ॥ सुखास्वादपरो यस्तु संसारे सत्समागमः । स वियोगावसानत्वादुःखानां धुरि युज्यते ॥ ७६ ॥ संसारमें सज्जनोंका संग अत्यन्त सुख देने वाला है, परन्तु उस संयोगके अंतमें वियोग होनेसे वह सुख-दुःखोंके आगे जोड़ा बन जाता है, अर्थात् अन्तमें दुःख देने वाला होता है ॥ ७६ ॥ अत एव हि नेच्छन्ति साधवः सत्समागमम् । यद्वियोगासिलूनस्य मनसो नास्ति भेषजम् ॥ ७७ ॥ इसीसे विवेकी जन अच्छे लोगोंके समागमको नहीं चाहते हैं कि जिसके वियोगरूपी तलवारसे कटे हुए मनकी औषध नहीं है ॥ ७७ ॥