हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-८५ ] संयम और सदाचरणकी प्रशंसा २४७ क्योंकि-कुसमयमें गिरनेसे उत्पन्न हुए, शरीरके मर्मस्थानको विदारण करने वाले कठोर शोकके प्रहारोंकी चिंता नहीं करना ही बड़ी औषधि है ॥८२॥ ततस्तद्वचनं निशम्य प्रबुद्ध इव कौण्डिन्य उत्थायाब्रवीत्—'तद- लमिदानीं गृहनरकवासेन । वनमेव गच्छामि ।' फिर उसका वचन सुन कर जागे हुएके समान उठके कौंडिन्य बोला-'अब नरकके समान घरका रहना ठीक नहीं है, वनकोही जाता हूँ । कपिलः पुनराह— 'वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः । अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥ ८३ ॥ कपिल फिर बोला-'प्रेमियोंको अर्थात् संसारके झगड़ोंमें फँसे हुओंको वनमें भी दोष अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, और मोहादिक होते हैं; घरमें भी पाँचों इन्द्रियोंका रोकना तपके समान है । और जो अच्छे काममें प्रवृत्त होता है और विषयादि रागोंको छोड़ देता है उसका घर ही तपोवन है ॥ ८३ ॥ यतः,— दुःखितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र कुत्राश्रमे रतः । समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ८४ ॥ क्योंकि-किसी आश्रममें अनुरक्त हो, दुःखी हो कर भी धर्मका आचरण करे और सब प्राणियोंमें समान स्नेह रक्खे; केवल सिर मुंडा कर गेरुए कपड़े आदि धारण वगैरह चिन्हही धर्मका कारण नहीं है ॥ ८४ ॥ उक्तं च,— वृत्त्यर्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् । वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यपि तरन्ति ते ॥ ८५ ॥ औरभी कहा है-जिन मनुष्योंका केवल 'आजीविकाके लियेही भोजन है, संतान उत्पन्न करनेके लियेही मैथुन है और सत्य वचन बोलनेके लियेही बाणी है वे कठिन स्थानोंसेभी पार हो जाते हैं ॥ ८५ ॥